रविवार, 13 अगस्त 2017

वृद्धावस्था विमर्श और हिंदी कहानी (शुभाशंसा)

वृद्धावस्था विमर्श और हिंदी कहानी
शिवकुमार  राजौरिया
2017
अद्वैत प्रकाशन,  नई दिल्ली
ISBN : 978-93-82554-87-5
रु. 595, पृष्ठ 295

जब मैं था नवयुवक, वृद्ध शिक्षक थे मेरे,
भूतकाल की कथा गूढ़ बतलाते थे वे.
मैं पढ़ने को नहीं, वृद्ध होने जाता था,
आग बुझा कर शीतल मुझे बनाते थे वे.
पर, अब मैं बूढ़ा हूँ, शिक्षक नौजवान हैं,
उन्हें देख निज सोयी वह्नि जगाता हूँ मैं.
भूत नहीं, अब परिचय पाने को भविष्य का
यौवन के विद्या-मंदिर में जाता हूँ मैं.
                                  (राष्ट्रकवि डॉ. रामधारी सिंह ‘दिनकर’)

काल की गति क्षिप्र है. वह इतनी शीघ्रता से चला जाता है कि उस पर किसी की दृष्टि नहीं जाती. एक नवजात शिशु कब अपनी शैशवावस्था छोड़कर युवावस्था में पहुँचा और कब वृद्धावस्था में, यह पता ही नहीं चलता. वृद्धावस्था से कोई बच नहीं सकता. यह जीवन का सत्य है लेकिन मनुष्य वृद्धावस्था की कल्पना मात्र से ही डर जाता है, निराश हो जाता है और सब चीजों से कटा हुआ महसूस करता है. कहा जाए तो वह केंद्र से परिधि की ओर चला जाता है. उपेक्षित हो जाता है; समाज से, परिवार से और यहाँ तक कि अपने आप से. लेकिन वार्धक्य कोई अभिशाप नहीं, बल्कि वह जीवन की चरम स्थिति है. अर्थात जीवन के विकास की चरमावस्था है वृद्धावस्था. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का कथन है कि ‘इस अवस्था में लोगों के सभी भाव रस के रूप में परिणत होकर आनंदमय हो जाते हैं.’ युवावस्था में प्रायः आडंबरप्रियता और प्रदर्शनप्रियता को देखा जा सकता है लेकिन वृद्धावस्था में ये सब नहीं रह जाते. वृद्धावस्था का सच्चा आनंद आत्मसंतोष है. जिन्हें भविष्य की कोई चिंता नहीं रहती वे ही वृद्ध हैं. कहने का आशय है कि 75-80 वर्ष के होने पर भी जिस व्यक्ति को भविष्य की चिंता होती है वह युवा ही है, क्योंकि उसे कार्यों को पूर्ण करने की चिंता जीवन में कुछ और बेहतर करने के लिए प्रेरित करेगी. जैसे-जैसे मनुष्य अपने आपको वृद्ध मानने लगता है, वह कमजोर महसूस करने लगता है तथा सहानुभूति अर्जित करने की इच्छा रखता है. धीरे-धीरे वह परिधि की ओर जाने के लिए विवश हो जाता है. प्रायः यह देखा जाता है कि जब तक व्यक्ति परिवार के लिए कमाने का यंत्र है तब तक उसकी चलती है लेकिन जैसे ही उसका शरीर उसका साथ देना छोड़ देता है वैसे ही परिवार के सदस्यों के लिए वह एक ‘बेकार चीज’ बन जाता है. ऐसे में उसका अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाता है. ऐसी स्थिति में उनका कुंठित होना स्वाभाविक है. 

भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में वृद्धों की स्थिति दयनीय नहीं कही जा सकती. यहाँ बड़ों का मान-सम्मान किया जाता रहा है. कहा भी गया है, “अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः / चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्”. अर्थात प्रतिदिन बुजुर्गों को प्रणाम करने और उनकी सेवा करने वाले व्यक्ति की आयु, विद्या, कीर्ति और शक्ति की वृद्धि होती है. लेकिन आजकल यहाँ भी स्थितियाँ बदल रही हैं. मूल्य बदल रहे हैं. परिवार का विघटन हो रहा है. वार्धक्य समस्या बनने लगा है. जैसे जैसे मनुष्य बुढ़ापे की ओर चलता है वैसे-वैसे अकेलापन, संत्रास, भय और असुरक्षा आदि उसको घेर लेते हैं. दरअसल उसे सुरक्षा और स्नेह की आवश्यकता होती है. बदलती परिस्थितियों में, वृद्धों के मनोविज्ञान को समझना भर काफी नहीं है बल्कि आज के परिप्रेक्ष्य में उनके पुनर्वास का प्रश्न प्रबल हो उठा है. 

उत्तरआधुनिक समय में लोगों की दृष्टि हाशियाकृत समुदायों पर पड़ी है तो स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक के साथ-साथ अब वृद्धों पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है. परिणामस्वरूप वृद्धावस्था विमर्श उभरकर सामने आया है. लेकिन सिमोन द बुआ (9 जनवरी, 1908 – 14 अप्रैल, 1986) ने 1950 से ही वृद्धावस्था पर चिंतन-मनन करना शुरू कर दिया था. 1970 में प्रकाशित उनकी शोधपूर्ण कृति ‘ला विएलेस्से’ (फ्रेंच) इसका प्रमाण है. ‘ला विएलेस्से’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘ओल्ड एज’ (पैट्रिक ओ ब्रेन) 1977 में प्रकाशित हुआ. सिमोन की भविष्योन्मुखी विश्वदृष्टि के कारण यह कृति वृद्धावस्था विमर्श की गीता बन गई. हिंदी में चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने इस कृति का सार-संक्षेप ‘’वृद्धावस्था विमर्श’’ शीर्षक से प्रस्तुत किया है.

यों तो इसमें संदेह नहीं कि समाज, साहित्य और संस्कृति में वृद्ध सदा उपस्थित रहे हैं लेकिन उनकी यह उपस्थिति केंद्र की अपेक्षा परिधि पर अधिक रही है. केंद्र से अपदस्थ होते ही व्यक्ति समाज की उपेक्षा का पात्र हो जाता है. यहाँ तक कि बहुत बार तो उसे अपना जीवन अभिशाप सा प्रतीत होने लगता है. परिधि पर धकेले गए (हाशियाकृत) एक समुदाय के रूप में वृद्ध समुदाय दुनिया का बहुत बड़ा उपेक्षित जन समुदाय है. वृद्धावस्था विमर्श इस उपेक्षित समुदाय की दृष्टि से, अथवा वृद्धावस्था को केंद्र में रखते हुए, समाज, साहित्य और संस्कृति की नई व्याख्या करने वाला विमर्श है. जैसा कि पहले संकेत किया जा चुका है, वृद्धों और वृद्धावस्था पर हमारे यहाँ चिंतन की बड़ी पुरानी परंपरा है तो सही; लेकिन उस चिंतन परम्परा में वृद्धों को समाज में पुनर्वासित करने के स्थान पर वन की ओर प्रस्थान करने (वानप्रस्थ) और सब कुछ त्याग देने (संन्यास) के आदेश निहित हैं. आज का वृद्धावस्था विमर्श इससे आगे बढ़कर वृद्धों को समाज में पुनर्वासित देखना चाहता है. हिंदी में इस दिशा में ‘वागर्थ’ ने दिसंबर 1999 में प्रकाशित वृद्धावस्था विशेषांक के माध्यम से गंभीर विमर्श की शुरुआत की और यह संकेत दिया कि इक्कीसवीं शताब्दी के विश्व के समक्ष वृद्धावस्था संबंधी समस्याएँ बड़ी चुनौती प्रस्तुत करनेवाली हैं. इस वैचारिक पीठिका पर हिंदी कहानी साहित्य में वृद्धावस्था के चित्रण का अनुसंधान और विश्लेषण ही डॉ. शिवकुमार राजौरिया के प्रस्तुत ग्रंथ “वृद्धावस्था विमर्श और हिंदी कहानी” का लक्ष्य है. भूमंडलीकृत विश्व द्वारा अनुभव की जा रही वृद्धावस्था विषयक विकट समस्या से संबंधित होने के कारण यह शोधपूर्ण ग्रंथ साहित्य के साथ-साथ समाज के संदर्भ में भी अत्यंत प्रासंगिक है.

इस ग्रंथ की व्यापकता का अनुमान इस तथ्य से सहज ही किया जा सकता है कि डॉ. शिवकुमार राजौरिया ने इसकी विवेच्य सामग्री के रूप में हिंदी कहानी साहित्य से उन कहानियों को चुनकर ग्रहण किया गया है जिनमें वृद्धावस्था को मुख्य विषय अथवा कथ्य के रूप में स्वीकार किया गया है. उन्होंने बताया है कि इन कहानियों में - बेटोंवाली विधवा (प्रेमचंद), बूढ़ी काकी, (प्रेमचंद), अलग्योझा (प्रेमचंद), माँ (प्रेमचंद), मंत्र, (प्रेमचंद), स्वामिनी (प्रेमचंद), विध्वंस (प्रेमचंद), सुभागी (प्रेमचंद), गुदड़ी में लाल (जयशंकर प्रसाद), ममता (जयशंकर प्रसाद), बेड़ी (जयशंकर प्रसाद), चीफ की दावत (भीष्म साहनी), यादें (भीष्म साहनी), चचा मंगलसेन (भीष्म साहनी), खून का रिश्ता (भीष्म साहनी), पागल है (यशपाल), समय (यशपाल), दुःख का अधिकार (यशपाल), कौन जाने (यशपाल), समय (यशपाल), कैलाशी नानी (सुभद्रा कुमारी चौहान), वसीयत (भगवती चरण वर्मा), परमात्मा का कुत्ता (मोहन राकेश), आजादी (ममता कालिया), उधार की हवा (मृदुला गर्ग ), बांसफल (मृदुला गर्ग), छत पर दस्तक (मृदुला गर्ग), उर्फ सैम (मृदुला गर्ग), मजबूरी (मन्नू भंडारी), मास्टर साहब (चंद्रगुप्त विद्यालंकार), पादुका पूजन (प्रतिभा राय), सीढ़ी (सूर्यबाला), सौगात (सूर्यबाला), दादी और रिमोट (सूर्यबाला), दादी का खजाना (सूर्यबाला), दादी माँ (शिवप्रसाद सिंह), दादी (शिवानी), माँ (ए.असफल), शापमुक्ति (रमेश उपाध्याय), जींस (मनोज कुमार पाण्डेय), ताई (विश्वंभरनाथ कौशिक), हरिहर काका (मिथिलेश्वर), वापसी (उषा प्रियंवदा), उतनी दूर (राज़ी सेठ), उसका आकाश (राज़ी सेठ), साधें (गोविन्द मिश्र), गेंद (चित्रा मुदगल), फाइल दाखिल दफ्तर (गिरिराज किशोर), अपना घर (रामधारी सिंह दिवाकर), बुढऊ का आधुनिकीकरण (गिरीश अस्थाना), हाँच (सुनील सिंह), उसका जाना (दिनेश चंद्र झा), फाग पिया संग (चन्द्रिका ठाकुर देशदीप), समय (सिद्धेश), यक्ष प्रश्न (दयानन्द पांडेय), बांधों न नाव इस ठांव बंधु (उर्मिला शिरीष), साँझ का परिंदा (आदर्श मदान), आँख मिचौनी (अमृतराय), बूढ़ा ज्वालामुखी (गिरिराज शरण अग्रवाल), घेरे (गोविन्द मिश्र), पिता (ज्ञानरंजन), सीमेण्ट में उगी घास (दयानन्द अनन्त), शटल (नरेन्द्र कोहली), तिनकों का घोंसला (प्रतिमा वर्मा), ग्राम माता (बाबू सिंह चौहान), दादी का बटुआ (मंजुल भगत), मोहताज (रामकुमार भ्रमर), अनाधिकृत स्वप्न (सत्यराज), पराजित (सुनील कौशिक), घुन (सुरेश उनियाल), मौत के लिए एक अपील (साजिद रशीद), मुट्ठी भर धूल (मुरारी शर्मा), कितने दीनू कितने दीनानाथ (राजेश झरपुरे), अम्मा (डॉ.श्रीमती कमल कुमार), नानी (संजीव दत्त शर्मा), बस कब चलेगी(संजय विद्रोही), बोनसाई (योगिता यादव), अपूर्णा (अलका सिन्हा), बाबूजी (डॉ.शिबन कृष्ण रैणा), माचिस की डिबिया (चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद) और खिड़की (राजेन्द्र कृष्ण) तथा माई (हरि भटनागर) - सम्मिलित हैं. 

विद्वान लेखक ने सबसे पहले तो वृद्धावस्था विमर्श की सैद्धांतिक पीठिका तैयार की है और वृद्धों की मानसिकता पर इस संदर्भ में विचार किया है कि वृद्धावस्था में व्यक्ति के मनोजगत में विभिन्न दैहिक , सामाजिक, आर्थिक और नैतिक कारणों से परिवर्तन घटित होते हैं. यहाँ वृद्धावस्था में परनिर्भरता से उत्पन्न कुंठाओं, और मूल्य परिवर्तन का विवेचन करते हुए वर्तमान विश्व के समक्ष उपस्थित वृद्धों के पुनर्वास की समस्या का भी विश्लेषण किया गया है. इसके बाद उन्होंने आधुनिकीकरण, भूमंडलीकरण और सामाजिक परिवर्तन के साथ भारतीय समाज में वृद्धों की बदलती हुई स्थिति तथा वृद्धों की सामाजिक समस्याओं का विवेचन किया है. इतनी विस्तृत पृष्ठभूमि निर्मित करने के बाद लेखक ने हिंदी कहानियों का वृद्धावस्था विमर्श के कोण से नया पाठ, जिसे वृद्ध-पाठ कहा जा सकता है, तैयार किया है. इसके लिए उन्होंने चयित कहानियों में अभिव्यक्त वृद्धों की मानसिकता का पहले तो वृद्धावस्था जनित असुरक्षा एवं उससे जुड़े मनोभावों -आशंका और अनिश्चितता - के चित्रण के संदर्भ में सोदाहरण विश्लेषण किया है. फिर एकाकीपन, स्मृति और मृत्युबोध के संदर्भ में वृद्धावस्था के चित्रण की प्रामाणिकता की सूक्ष्म और गहन पड़ताल की है.

डॉ. राजौरिया के इस ग्रंथ का एक और सर्वथा मौलिक योगदान वृद्धों की भाषा का सामाजिक संदर्भ को खोज निकालने से सम्बंधित है. उन्होंने वृद्धों की भाषा के संदर्भ में चयित कहानियों का पाठ विश्लेषण यह मान कर किया है कि समाजभाषिक दृष्टि से व्यक्ति का भाषा व्यवहार की उसकी सामाजिक स्थिति पर निर्भर रहता है. लेखक ने जहाँ एक ओर यह प्रतिपादित किया है कि वृद्धजन का भाषिक आचरण उनके अनुभव और आयु से जुड़े बड़प्पन को प्रकट करता है, वहीं यह भी सिद्ध किया है कि कहानीकारों ने वृद्ध पात्रों के संवादों के गठन में घर-परिवार और समाज में उनके स्थान, पद और रुतबे के साथ-साथ उनकी हाशियाकृत एवं उपेक्षापूर्ण स्थिति का ध्यान रखते हुए ऐसी भाषा का प्रयोग किया है जो वृद्धों की सामाजिक-मानसिक दशा का प्रतिबिंब है. वार्ता आरंभ, वार्ता परिवर्तन, प्रश्न, आदेश और विनम्रता से जुड़े वृद्धों के संवादों का सामाजिक स्थिति के संदर्भ में ऐसा विश्लेषण अन्यत्र दुर्लभ है. मेरी समझ में इसका कारण यह है कि डॉ. शिवकुमार राजौरिया ने यह समस्त कार्य डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी की देखरेख में उनसे वृद्धावस्था विमर्श और समाजभाषाविज्ञान की दीक्षा लेकर संपन्न किया है.

यहाँ एक और बात की चर्चा मुझे ज़रूरी लग रही है. वह यह कि इस ग्रंथ की तैयारी के लिए कहानी साहित्य का अध्ययन-मनन करते- करते शिवकुमार राजौरिया स्वयं कीटभृंगी न्याय से कहानीकार बन गए. दरअसल डॉ. ऋषभदेव शर्मा प्रायः उन्हें प्रेरित करते रहते थे - इतनी कहानियाँ पढ रहे हो, कुछ अपना भी लिखो ना! - और एक दिन कुलबुलाते बीज में अंकुर निकल आया. एक परिचित वृद्ध को केंद्र में रखकर उन्होंने एक कहानी लिख दी - ‘बूढी हड्डियाँ’. तनिक नोक पलक संवारकर कहानी छपने के लिए भिजवा दी गई. हफ्ते भर में ‘स्वतंत्र वार्ता’ में छप भी गई. बस फिर क्या था लेखक की धड़क खुल गई और इस ग्रंथ के साथ-साथ उनका कहानी लेखन भी चल निकला कोई तीस कहानियाँ तो हो ही गई होंगी!- अधिकतर वृद्धावस्था विमर्श पर केंद्रित! स्रवंति, दक्षिण समाचार, हिंदी मिलाप, स्वतंत्र वार्ता और श्रीमिलिंद में लगातार छपती भी रहीं. संग्रह भी आ गया –‘ऑटोग्राफ एवं अन्य कहानियाँ’ (2012 : चेतक बुक्स, 1075, फ्लैट संख्या 3, बी विंग, येवले म्हस्के अपार्टमेंट ,सदाशिव पेठ, पूना-30) जिसे सुधी पाठकों और विद्वानों का भरपूर स्नेह मिला. 

मुझे पूर्ण विश्वास है कि डॉ. शिवकुमार राजौरिया के इस ग्रंथ को भी हिंदी जगत में स्नेह और सम्मान मिलेगा. मैं उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामना व्यक्त करती हूँ. साथ ही, इस अत्यंत मौलिक, प्रासंगिक, महत्वपूर्ण, पठनीय एवं संग्रहणीय ग्रंथ को पाठकों तक पहुँचाने के लिए प्रकाशक को भी बधाई देना चाहती हूँ. 

अनंत शुभेच्छाओं सहित,

30 अप्रैल, 2017                                                                                                         – गुर्रमकोंडा नीरजा 
                                                                                                                                              प्राध्यापक 
                                                                                                                  उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
                                                                                                                 दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा 
                                                                                                               खैरताबाद, हैदराबाद – 500004.
                                                                                                                 neerajagkonda@gmail.com

समकालीन सरोकार और साहित्य (भूमिका)

समकालीन सरोकार और साहित्य 
संपादक : ऋषभ देव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा
अतुल्य पब्लिकेशंस, सी -5 /एफ - 2, ईस्ट ज्योति नगर, दिल्ली - 110 093
प्रथम संस्करण : 2017
मूल्य : रु 500
ISBN  : 978-93-82553-66-3  

दक्षिण भारत में किए जा रहे हिंदी भाषा और साहित्य विषयक शोध लेखन की एक छवि प्रस्तुत करने के लिए पिछले दो वर्षों में हमने दो पुस्तकें ‘संकल्पना’ (2015) तथा ‘अन्वेषी’ (2016) हिंदी पाठकों को समर्पित की हैं। ‘समकालीन सरोकार और साहित्य’ इस शृंखला की तीसरी कड़ी है। विशेष रूप से शोधार्थियों की माँग पर इसमें शोध विमर्श संबंधी व्यावहारिक जानकारियाँ शामिल की गई हैं। साथ ही इसका क्षेत्र अब दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है। 

हिंदी साहित्य और भाषा विषयक अनुसंधान के क्षेत्र में शोध पत्र और शोधप्रबंध के लेखन में मानकता की दृष्टि से प्रायः बड़ी अराजकता देखने को मिलती है। इसका एक बड़ा कारण शोध लेखन के संबंध में स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय प्रारूपों के प्रति उपेक्षा भाव है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए शोध संबंधी मानक लेखन के लिए व्यापक रूप से स्वीकृत दो प्रारूपों की हिंदी के संदर्भ में प्रस्तुति इस पुस्तक को विशिष्ट बनाती है। ए.पी.ए. और एम.एल.ए. प्रणालियों की यह जानकारी हिंदी में पहली बार इस रूप में प्रस्तुत की जा रही है जो शोधार्थियों और शोध निर्देशकों के लिए समान रूप से उपयोगी है। इसके अलावा हिंदी में शोध की संभावनाओं एवं सकारात्मक मनोविज्ञान जैसी नई दिशाओं का उद्घाटन करने वाली सामग्री भी अत्यंत उपयोगी है। 

यह पुस्तक समसामयिक अद्यतन हिंदी शोध में लोकप्रियता प्राप्त कर रहे दलित एवं स्त्री आदि हाशिया विमर्शों के आलोक में कविता, उपन्यास और कहानी जैसी विधाओं का पुनर्पाठ तो प्रस्तुत करती ही है, साथ ही भाषा विमर्श और मीडिया विमर्श के नए आयामों को भी प्रस्तुत करती है। 

विश्वास है कि भाषा और साहित्य संबंधी अनुसंधानकर्ताओं और सुधी पाठकों को हमारा यह प्रयास पसंद आएगा। 

पुस्तक के सुरुचिपूर्ण मुद्रण एवं प्रकाशन के लिए हम अतुल्य पब्लिकेशन्स के श्री अतुल माहेश्वरी और श्री आदित्य माहेश्वरी के प्रति विशेष रूप से आभारी हैं। इस पूरी योजना में सहयोग के लिए श्री वी. कृष्णाराव का हार्दिक धन्यवाद।

1 मई, 2017                                                                                                                       - ऋषभ देव शर्मा 

                                                                                                                                        गुर्रमकोंडा नीरजा 

शनिवार, 3 जून 2017

आत्मकथा के बहाने छत्तीसगढ़ की अंचल कथा

मुझे कुछ कहना है – III (2017)/ डॉ. रामनिवास साहू/ गाजियाबाद : उद्योगनगर प्रकाशन/ पृष्ठ 136/ मूल्य : रु. 200/-
हिंदी गद्य साहित्य में आत्मकथा लेखन की परंपरा अत्यंत समृद्ध है. महापुरुषों, साधु-महात्माओं, समाज सुधारकों, राजनेताओं और साहित्यकारों ने अपने बाहरी और भीतरी जीवन संघर्ष को आत्मकथाओं के माध्यम से इस तरह व्यक्त किया है कि पाठक को उनसे प्रेरणा प्राप्त होती है. आत्मकथाओं के अगले वर्ग में वे रचनाएँ आती हैं जिनमें निज के बहाने लेखकों ने अपने समुदाय के कष्टों और सच्चाइयों का उत्तम पुरुष शैली में वर्णन किया है और दलित विमर्श तथा स्त्री विमर्श को धार देने में कामयाबी हासिल की है. इसी की अगली कड़ी के रूप में आंचलिक विमर्श को एक नया आयाम डॉ. रामनिवास साहू ‘मुझे कुछ कहना है’ शीर्षक अपनी बहुखंडीय आत्मकथा के माध्यम से देने का प्रयास कर रहे हैं. 

यहाँ ठहर कर यह जान लेना जरूरी है कि – ये डॉ. रामनिवास साहू हैं कौन? उनका जन्म वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के कोरबा जिला के वनवासी अंचल कोरबी में 21 फरवरी, 1954 को हुआ. उनके पूर्वज दो पीढ़ी पहले ही इस वनांचल में आकर बसे थे. कोरबी में जन्मे इस बालक ने किन विपरीत परिस्थितियों में किस-किस तरह के पापड़ बेलते हुए कैसे-कैसे उच्च शिक्षा प्राप्त करने की अपनी जिद पूरी करके दिखाई और कैसे भाषाविज्ञान में एमए करके छत्तीसगढ़ की मुंडा भाषाओं के सर्वेक्षण जैसे विषय पर पीएचडी हासिल की, यह भी इस आत्मकथा का हिस्सा है. साथ ही एक छोटे ग्रामीण दुकानदार का बेटा कैसे अंधविश्वास, कलह और भितरघात से ग्रसित परिवेश से निकलकर केंद्रीय हिंदी संस्थान के क्षेत्रीय निदेशक पद तक पहुँचा, इसकी गाथा भी निरंतर परिश्रम और मूल्यनिष्ठा के प्रति आस्था जगाने वाली गाथा है. 

यों तो डॉ. रामनिवास साहू अपने विद्यार्थी काल से ही कुछ न कुछ लिखते रहे हैं. वनवासी और बिगुल शीर्षक से उनकी दो पुस्तकें क्रमशः 2002 और 2003 में आ चुकी हैं तथा भाषाविज्ञान और पत्रकारिता पर भी उनकी चार किताबें आई हैं; लेकिन ‘मुझे कुछ कहना है’ उनके लेखन की नई पारी का प्रतीक है. इसके दो खंड (पहला और तीसरा) 2017 की प्रथम छमाही में प्रकाशित हुए हैं. लेखक की घोषणा के अनुसार आगे और तीन खंड आने हैं. 

इस औपन्यासिक आत्मकथा के तीसरे खंड की भूमिका में लेखक ने बताया है कि “मेरा जीवनवृत्त बहुत ही सुंदर, सुदृढ़ तथा स्वर्णमय है. यह उस गाँव के लिए अत्यंत गौरवमय है जिससे प्रेरित होकर हर कोई देश को, राष्ट्र को समझना चाहेगा तथा राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा में आने के लिए स्वतः प्रेरित होकर सोपान-दर-सोपान कदम बढ़ाना चाहेगा.” इसका अर्थ यह है कि लेखक अपनी आत्मकथा को छत्तीसगढ़ के उस अंचल की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्पद मानता है जिसकी जमीन से वह स्वयं उगा है. इस खंड में उनके सोलहवें वर्ष की कथाएँ हैं.

किसी व्यक्ति के जीवन में सोलहवाँ वर्ष बड़ा महत्वपूर्ण होता है. किशोरावस्था के सपने इसी उम्र में आँखों में अंगडाई लेते हैं और यही उम्र यह तय करती है कि वह व्यक्ति किस दिशा में जाएगा. यहाँ कथानायक भविष्य के सपने बुन रहा है. इन सपनों में अब फ़िल्मी नायक-नायिका आने लगे हैं. हर महीने फिल्म देखने का नियम जैसा बन गया है. इस फिल्म-प्रेम ने कथानायक के मन में सामाजिक सवाल खड़े किए और बोध का निर्माण करने में बड़ी भूमिका निभाई. गाँव की प्रभातफेरी और रामचरितमानस के पाठ जैसी चीजों ने उसके इस बोध को राष्ट्रीयता के साथ जोड़ा. कॉलेज जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों ने भी कई तरह के मानसिक द्वंद्व खड़े किए, लेकिन भटकने की सारी सुविधाओं के बावजूद कथानायक की दृष्टि से शिक्षा रूपी मछली की आँख कभी ओझल नहीं हो सकी. आचार-विचार की सहजता का संस्कार उसे अपने माता-पिता और पालनहारी पिसौदहीन बड़कादाई से मिला था जिसे श्रीराम शर्मा आचार्य के जीवन दर्शन ने और भी ऊँचाई प्रदान की. यही वह संबल था जिसने कथानायक को कीचड़ में कमलवत रहने की दीक्षा दी. 

इसमें संदेह नहीं कि ‘मुझे कुछ कहना है’ के इस तीसरे खंड में छत्तीसगढ़ के आंचलिक वनवासी जीवन के अँधेरे-उजाले का संघर्ष लेखक के अपने जीवनसंघर्ष के ‘बैकड्रॉप’ के रूप में चित्रित है. ये दोनों संघर्ष एक-दूसरे को उभारकर दिखाते हैं और पाठक आत्मकथा के बहाने अंचलकथा का भी आनंद प्राप्त करता चलता है. 

पुस्तक के प्रकाशन पर लेखक और प्रकाशक को हार्दिक बधाई.  

गुरुवार, 1 जून 2017

हिंदी साहित्य को सैयद गुलाम नबी ‘रसलीन’ का प्रदेय

[1]

भारतीय संस्कृति की आत्मा इस देश की विविध भाषाओं के माध्यम से अभिव्यक्ति प्राप्त करती है। भारत की सभी भाषाएँ और उनकी साहित्यिक विरासत सबकी साझी संपदा है और उसे सभी देशवासियों ने समृद्ध किया है, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान या किसी अन्य धर्म-संप्रदाय के अनुयायी। इनमें भी हिंदी अपने केंद्र से बाहर फैलने वाले चरित्र और सर्वसमावेशी स्वरूप के कारण सब को जोड़ने वाली भाषा रही है। इसके साहित्य की समृद्धि में आरंभ से ही मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान इसे सबकी साझा विरासत प्रमाणित करता है। दरअसल हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में उर्दू, सिंधी, मराठी, गुजराती, तेलुगु आदि भाषाओं के साहित्यकारों का उल्लेखनीय योगदान है। 

हिंदी साहित्य की भूमिका का निर्माण करने में अपभ्रंश साहित्य ने नींव का काम किया। उस अर्थात अपभ्रंश काल में ‘संदेश रासक’ के रचनाकार अद्दाहमाण या अब्दुल रहमान को कौन नहीं जानता। आगे चलकर खुद की ‘हिंदी की तूती’ घोषित करने वाले अमीर खुसरो को तो खड़ी बोली के पहले कवि होने का गौरव हासिल हुआ। उनके बाद मलिक मुहम्मद जायसी, उसमान, कासिमशाह, नूर मुहम्मद, आलम, जमाल, रहीम, सैयद मुबारक अली बिलग्रामी, सैयद गुलाम नबी ‘रसलीन’ आदि अनेक मुस्लिम साहित्यकारों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। इनकी रचनाओं में सामासिक संस्कृति, समन्वय की भावना तथा गंगा-जमुनी तहजीब को रेखांकित किया जा सकता है। 

जब कभी मध्यकाल में हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले मुस्लिम साहित्यकारों की बात होती है तो चर्चा प्रायः जायसी से शुरू होकर रहीम तक आकर सिमट जाती है। ‘रसलीन’ का नाम भर ले लिया जाता है। जबकि वे इससे अधिक के अधिकारी हैं। मैं महज उन्हीं के प्रदेय पर संक्षेप में चर्चा कर रही हूँ। 

[2]
अमिय, हलाहल, मद भरे, सेत स्याम रतनार। 
जियत, मरत, झुकि झुकि परत, जेहि चितवत इक बार॥

कई बार बिहारी का समझ लिया जाने वाला यह दोहा ‘रसलीन’ का है। 

‘अंग दर्पण’ (1737 ई.) और ‘रस प्रबोध’ (1749 ई.) के रचनाकार, ‘रसलीन’ (1689-1750) उपनाम से विख्यात रीतिग्रंथकार का पूरा नाम है सैयद गुलाम नबी ‘रसलीन’। ये जिला हरदोई के बिलग्राम के रहने वाले थे। इनके पिता सैयद मुहम्मद बाकर थे। रसलीन ने स्वयं अपनी वंश परंपरा के बारे में कहा है कि उनके पूर्वज हिंदुस्तान में आकर बस गए थे।[1] रसलीन ने हिंदुस्तान के लिए ‘हिंदुवान’ शब्द का प्रयोग किया है। इस शब्द का प्रयोग चंद्रबरदाई कृत ‘पृथ्वीराज रासो’ के ‘पद्मावती समय’ में भी प्राप्त होता है। 

रसलीन के जन्म के बारे में एक दोहे में संकेत किया गया कि ‘मैं (रसलीन) सूरी के फूल (सूरजमुखी) के समान खिला हूँ और अपनी जन्म तिथि जो मैंने स्वयं कही ‘नूर चश्मे बाकरे अब्दुल हमीदम’ (1111 हिजरी) है।‘[2] इसके अनुसार गणना करके रामनरेश त्रिपाठी ने रसलीन के जन्म का वर्ष सन 1689 ई. माना है।[3]

‘हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास (भाग 6)’ से पता चलता है कि रसलीन केवल कवि नहीं थे अपितु वे सुयोग्य सैनिक, तीरंदाज और घुड़सवारी में निपुण व्यक्ति थे। नवाब सफदरजंग की सेवा में थे और उनकी सेना के साथ पठानों से युद्ध करते हुए आगरा के समीप सन 1750 ई. में शहीद हुए। ‘रसलीन ग्रंथावली’ में इस बात का उल्लेख है कि “जीवन यापन के क्षेत्र में अपने कर्म के कारण वे प्रतिष्ठित थे। स्वाभिमान उनका ऐसा था कि किसी के भी सामने वे झुकने वाले नहीं थे। इसीलिए गुरु, ईश्वर, धर्म दूतों, पूर्वजों, संतों आदि की स्तुति एवं प्रशंसा तो उन्होंने की है पर किसी राजा-महाराजा, नवाब या स्वामी की प्रशंसा से अपनी लेखनी का मुख मलीन नहीं किया।“[4]

रसलीन की प्रसिद्ध पुस्तक ‘अंग दर्पण’ में कुल 180 दोहे सम्मिलित हैं। ‘हिंदी साहित्य कोश’ के अनुसार “यद्यपि रसलीन ने इसे ‘ब्रजबानी सीखन रची’ (अर्थात ब्रजभाषा सीखने के लिए रचित) घोषित किया है, पर भाषा और शैली की दृष्टि से यह प्रौढ़ तथा सुकुमार रचना है।“[5] इसमें नायिका के अंगों, आभूषणों, भंगिमाओं, चेष्टाओं आदि का उपमा तथा उत्प्रेक्षा युक्त चमत्कारपूर्ण वर्णन निहित है। 

रसलीन ने 'रस प्रबोध' नामक रस निरूपण ग्रंथ का भी सृजन किया। इसमें कुल 1127 दोहे सम्मिलित हैं जिनमें रस, भाव, नायिकाभेद, षट्ऋतु वर्णन, बारहमासा आदि अनेकानेक प्रसंग निहित हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की मान्यता है कि “रसविषय का अपने ढंग का यह छोटा और अच्छा ग्रंथ है।‘[6] रसलीन ने भी स्वयं इस बात पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस छोटी सी पुस्तक को पढ़ने लेने पर रस विषयक जानकारी हेतु किसी अन्य पुस्तक को पढ़ने की आवश्यकता नहीं रहेगी। इस पुस्तक में मुख्य रूप से शृंगार रस और नायिका भेद का विस्तार है। अन्य रसों के संक्षिप्त वर्णन सम्मिलित है। “इनका सिद्ध छंद दोहा है, समस्त ग्रंथ छंद में है, लक्षण हों या उदाहरण।“[7]

रसलीन की दोनों रचनाओं का अध्ययन करने पर यह पता चलता है कि उन्हें भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा और रूढ़ियों की गहरी जानकारी थी। उसकी बारीकियों को आत्मसात करके उन्होंने इन रीतिग्रंथों की रचना की। विभिन्न लक्षणों का उल्लेख करने के बाद उन्होंने जो उदाहरण दिए हैं उनमें भारतीय संस्कृति, इतिहास, लोक और पुराण के संदर्भ निहित हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि वे संस्कृत के बड़े विद्वान थे। 

[3]

गंगा जमुनी तहज़ीब 

यह ठीक है कि रसलीन सैयद मुस्लिम थे लेकिन वे संस्कृत भाषा और साहित्य के पंडित थे और उन्होंने जिस प्रकार हिंदी साहित्य को समृद्ध किया उससे यही कहा जा सकता है कि हिंदी किसी धर्म विशेष की भाषा नहीं है बल्कि हिंदुओं और मुसलमानों की साझी विरासत है जिसमें इनकी गंगा-जमुनी तहज़ीब समाई हुई है।

रसलीन ने अपने दोहों में गुरु, ईश्वर, पैगंबर, नबी, पूर्वजों और संतों की स्तुति तो की है लेकिन किसी राजा-महाराजा या नवाब की प्रशंसा नहीं की। बिलग्राम में हिंदू-मुसलमान सभी अपने-अपने धर्म की उपासना करते थे, बिना किसी दबाव के। वे अपने धर्म के साथ-साथ दूसरों के धर्म का सम्मान करते थे। रसलीन सहिष्णु थे। उनके दोहों में मुहम्मद साहब, हजरत अली, इमाम हसन, इमाम हुसैन, मुईनुद्दीन चिश्ती, पीर आदि के साथ-साथ राम, हनुमान, लक्ष्मण, राधा, कृष्ण, पार्वती, सरस्वती, इंद्र आदि के संदर्भ गुंथे हुए हैं। वे कृष्ण की वंशी का वर्णन[8] करते हुए कहते हैं कि वंशी गोपियों को उनके वंश से इस तरह अलग करके उनके प्राण ले लेती है जैसे मछली पकड़ने वाला काँटा मछली को जल से अलग करके उसके प्राण हर लेता है। यह बाँसुरी कृष्ण के अधरों की सुधा का पान करती है लेकिन अपनी ध्वनि के रूप में ऐसा विष उगलती है जो गोपियों को बिलखने के लिए विवश करता है। वंशी माधुरी का प्रभाव इतना सम्मोहक है कि उसके रस में देह और अदेह सभी लीन हो जाते हैं और पशु-पक्षी तक इस प्रकार स्तंभित हो जाते हैं कि मानो किसी ने उन्हें मार ही डाले हो। रसलीन की गोपिका तो यहाँ तक कहती है कि ब्रह्मा ने इस भय से ही शेष नाग को कान नहीं दिए हैं कि कहीं कृष्ण की वंशी की ध्वनि सुनकर वह धरती को अपने सिर से फेंक कर इस ध्वनि पर झूमने न लगे। यह वर्णन इस बात की गवाही देता है कि सैयद गुलाम नबी ‘रसलीन’ श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के उस प्रसंग से भलीभाँति परिचित थे जिसमें मुनि शुकदेव ने राजा परीक्षित को कृष्ण की वंशी के सम्मोहक प्रभाव के बारे में बताया है। अभिप्राय यह है कि रसलीन ने विषय वस्तु और प्रतीकों का चयन भारतीय महाकाव्यों की परंपरा से किया है, फ़ारसी साहित्य से नहीं। इसीलिए उनका साहित्य सही अर्थों में भारतीय संस्कृति का वाहक प्रतीत होता है। 

इसी प्रकार एक और दोहे में रसलीन ने कहा कि भादों के दिन जादव के बिना अर्थात यादवकुल के श्रीकृष्ण के बिना बिताना कठिन है।[9] भयानक रस का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि रावण के दस मुँह और बीस बाँह हैं, यह सुनकर राम की वानर सेना भयभीत हो गई। अचानक रावण का रूप देखकर वानर सेना धूप की भाँति पीली पड़ गई।[10] इस प्रकार के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं जिनमें कवि ने राम और कृष्ण की कथा से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख किया है। यह तभी संभव है जब कवि ने इन कथाओं को आत्मसात कर रखा हो। 

रसलीन उदारमना सहिष्णु कवि थे। वे इस्लाम धर्म के अनुयायी थे परंतु किसी भी प्रकार का कट्टरवाद उन्हें छू भी नहीं गया था। रीतिकाल के इस कवि में किसी संत कवि जैसी उदारता दिखाई देती है। वस्तुतः “संत और कवि होने के लिए आदमी होना पहले आवश्यक है, फिर कुछ और। अपने धर्म का सच्चा अनुयायी दूसरे धर्म को गिराता नहीं क्योंकि किसी को उठा कर जो श्रद्धार्जन नहीं कर सकता, वह किसी को गिरा कर स्वयं ऊँचा नहीं उठ सकता।“[11] रसलीन सही अर्थ में मनुष्य थे और अपने धर्म के श्रद्धावान अनुयायी। इसलिए अन्य धर्मों के प्रति वे परम सहिष्णु थे। इस सहिष्णुता को उनके व्यक्तित्व एवं साहित्य में भलीभाँति देखा जा सकता है। 

रसलीन अपने गुरु तुफ़ैल मुहम्मद बिलग्रामी की प्रशस्ति करते हुए उन्हें देवगुरु वृहस्पति का अवतार बताते हैं - “देस बिदेसन के सब पंडित/ सेवत हैं पग सिष्य कहाई।/ आयो है ज्ञान सिखावन को/ सुर को गुरु मानुस रूप बनाई।“[12] इससे न केवल रसलीन के गुरु की महिमा प्रतिष्ठित होती है, अपितु उन्हें बृहस्पति के समान मान कर अपने जिस संस्कार का बोध कवि ने कराया है वह सर्वथा भारतीय है। इस संस्कार ने ही वस्तुतः गंगा-जमुनी तहज़ीब का निर्माण किया है। 

रसलीन संस्कृत काव्यशास्त्र की परंपरा में निष्णात है। उन्होंने आवश्यकतानुसार भरत के नाट्यशास्त्र, केशव की कविप्रिया तथा संस्कृत-हिंदी ग्रंथों के मतों का उल्लेख मात्र ही नहीं किया, अपितु उन पर अपने चिंतनशील विचार भी व्यक्त किए। उनके काव्य की परिधि विस्तृत है। वह केवल शृंगार वर्णन तक सीमित नहीं। बड़ी बात यह है कि उनके काव्य में भारतीयता का समावेश है। इसमें उन्होंने तत्कालीन लोकजीवन की अनुभूतियों को मूर्तित किया है, लोक जीवन में प्रचलित कथाओं, मान्यताओं, अनुभूतियों आदि को उकेरा है। उस युग के व्यक्ति का जीवन इतना जटिल नहीं था जितना आज है। उस समय पीर और शहीद के प्रति आस्था थी तो लोग मंदिर और पाठशाला भी बनवा देते थे। यही कारण है कि रसलीन जहाँ नबी की स्तुति[13] करते हैं वहीं भगीरथी गंगा की भी स्तुति एक हिंदू भक्त की भाँति भारतीय पद्धति के अनुसार करते हुए स्मरण करते हैं कि गंगा विष्णु के पैरों से निकलकर शिव के सीस में जा बसी।[14] इसे पढ़ते समय रहीम का दोहा याद आता है कि “अच्युत चरन तरंगिनी, शिव सिर मालति माल।/ हरि न बनायो सुरसरी, कीजो इंदव भाल।“ 

भारतीय परंपरा में किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले विघ्नविधाता गणपति की स्तुति की जाती है। रसलीन भी ‘रस प्रबोध’ में सोहिल विवाह के प्रसंग में गणपति की आराधना करते हैं – “गनपति आराधि आदि, उत्तम सगुन साधि/ सुभ घरी, धरी लगन।/ गावत गुनीन गायन, मोहत नर नारायन/ इंद्रादिक सुन सुन होत मगन॥“[15] यहाँ गणपति की आराधना, उत्तम शकुन साधना, शुभ घड़ी और शुभ लग्न विचारना और नर-नारायण तथा इंद्रादिक देवों का उल्लेख कवि के भारतीय परंपरा में पगे होने का प्रमाण है। 

‘रसप्रबोध’ की शुरूआत में भी रसलीन मंगलाचरण[16] करते हैं कि अल्लाह - अलह अर्थात अगोचर है, अनादि है, अनंत है नित्य पवित्र सृष्टि करने वाला है, सृष्टिकर्ता है। वह असीम है। वह सर्वत्र व्याप्त है। 

अच्छे कलाकार की पहचान यह है कि वह कभी भी अपनी रचना से पूर्ण संतुष्ट नहीं होता। संतोष का अर्थ जड़ता है जो रचनाकार का अभिमत नहीं। इसीलिए शायद रसलीन अपने भावों को व्यक्त करने के लिए छंदों का आधार लेकर भावचित्रों को उकेरते हैं। उनके पास शब्द भंडार की अक्षय निधि है। वे तत्कालीन भाषाओं – अरबी, फारसी, संस्कृत, रेख्ता के पंडित थे।[17] अतः वे शब्द चयन का ऐसा परिचय देते हैं कि उनके द्वारा चयनित शब्द सहज प्रतीत होते हैं। अन्य रीतिकालीन कवियों की भाँति रसलीन ने भी प्रकृति वर्णन किया है लेकिन इनका प्रकृति चित्रण केवल नदी, पहाड़, जंगल, ग्रह, नक्षत्र आदि तक सीमित न होकर उनके प्रभाव से उत्पन्न परिणाम का भी परिचायक है।[18] साथ ही, उनकी सौंदर्यबोध भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपरा के आधार पर विकसित प्रतीत होता है। 

रसलीन के प्रकृति चित्रण में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देगा कि कवि ने कहीं कहीं प्रकृति का मानवीकरण किया है तो कहीं प्रकृति को स्वतंत्र रूप में ग्रहण किया है। प्रकृति चित्रण द्वारा सहृदय पाठक को प्रभावित करने के लिए वे प्रकृति के जिन तत्वों को उपमान के रूप में प्रयोग करके भाव तथा रूप विधान को प्रस्तुत करते हैं[19], वह भी भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपरा और संस्कृत से चली आ रही सौंदर्य चेतना के अनुरूप है। यह तथ्य भी रसलीन को भारतीय तहज़ीब के उन्नायक के रूप में प्रतिष्ठित करता है। इस तरह के चित्रण के लिए उन्होंने लोक जीवन के अनुभव का सहारा लिया है। सहज आस्था और विश्वास लोक से ही प्राप्त किया जा सकता है। रसलीन के काव्य में लोक पग-पग पर मुखरित है। उदाहरण स्वरूप छ्ट्ठी,[20] पालना,[21] समधिन[22] आदि विषयों पर लिखे गए दोहों की चर्चा की जा सकती है। 

रसलीन ने अपने दोहों के माध्यम से गोपालन की भारतीय संस्कृति को भी दर्शाया है। वे कहते हैं कि आँख या दृष्टि रूपी मथनी से मेरे हृदय रूपी मटकी को मथ करके ग्वालिनी मेरे मन का मक्खन ले गई। और अब शरीर छाछ की तरह हो गया है।[23] गौ-संस्कृति से अनुप्राणित व्यक्ति ही गोकुल-गोपी-गोपाल की लीला का इतना समर्थ सांगरूपक रच सकता है। 

अद्वैत का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए रसलीन कहते हैं कि हम दोनों एक हैं। मन से इसे समझो। ‘मान’ के कारण ही ‘भेद’ उत्पन्न होता है। अतः भूलकर भी प्रिय से विमुख नहीं होना चाहिए।[24]

इसके साथ ही रसलीन ऐसे भाषाविद भी हैं कि उनका काव्य लोक मान्यताओं, आस्थाओं और लोकोक्तियों का समुच्चय प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए - 

  • आली बानर हाथ मैं परयो नारियर जाइ (बंदर के हाथ में नारियल, ग्लानि लक्षण, उदाहरण, रस प्रबोध, 836) 
  • आली चाटे ओस के कैसे ताप बुझाय (ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती; कामवती उदाहरण, रस प्रबोध, 304) 
  • गुरुजन उर दुरजन भये देखन देत न छाहिं (गुरुजनसभीता-असाध्या, रस प्रबोध, 225)
  •  रोग ठानि कै ढीठ तिय निपुन वैद करि ईठि। (पतिवंचिता-लक्षण, रस प्रबोध, 272)
  • तिहि तरुवर दहियत नहीं, रहियत जाकी छांह। (जिस पेड़ की छाया में रहते हैं उसे जलाया नहीं जाता; वियोग शृंगार, भेदोपाय उदहारण, 972) 
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि अपनी काव्य वस्तु, उसमें निहित काव्य प्रेरणा, काव्य रूढ़ियों के पालन तथा काव्यभाषा के गठन आदि विविध दृष्टियों से रसलीन भारतीय लोक, भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और भारतीय भाषा संपदा के गहरे पारखी, अध्येता और सर्जक थे। उनकी रचनाएँ यह प्रमाणित करने के लिए अत्यंत प्रबल साक्ष्य देती हैं कि हिंदी भाषा और साहित्य किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है बल्कि इसके विकास में सभी धर्मों के मानने वाले रचनाकारों का योगदान रहा है जिसके कारण यह भारतीय गंगा-जमुनी तहज़ीब प्रतीक बन गया है। 

संदर्भ 

[1] प्रगट हुसेनी बासती, बंस जो सकल जहान।/ तामैं सैद अब्दुल फरह, आए मधि हिंदुवान। (रस प्रबोध, कवि कुल कथन), रसलीन ग्रंथावली, पृ. 5 

[2] नूर चश्मे मीर बाकर गुफ्त बामन/ चूँ गुले खुरशीद दर आलम दमीदम/ साल तारीखे तवल्लुद खुद बेगुफ्तम/ नर चश्मे बाकरे अब्दुल हमीद। रसलीन ग्रंथावली, पृ. 55 

[3] (सं) वर्मा, धीरेंद्र. (2007, पुनर्मुद्रण). हिंदी साहित्य कोश, भाग -2. वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड. पृ. 480 

[4] तजि द्वार ईस को नवायो सीस मानुस को।/ पेट ही के काज सब, लाज खोइ बावरे। रसलीन ग्रंथावली, पृ. 303 

[5] वही, पृ. 1 

[6] शुक्ल, रामचंद्र. (संवत 2042 वि., इक्कीसवाँ पुनर्मुद्रण). हिंदी साहित्य का इतिहास. काशी : नागरी प्रचारिणी सभा. पृ. 197 

[7] (सं) वर्मा, धीरेंद्र. (2007, पुनर्मुद्रण). हिंदी साहित्य कोश, भाग -2. वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड. पृ. 477 

[8] बंसी ह्वै छुड़ावत है, बंस तैं न रीत कछू,/ बंसी सम लेत प्रान मीन को निकारि के./ अधर सुधा में लग उगलत हैं बिख एतो,/ अद्भुत भयो है यह जगत निहारि के./ मोहै मन देव औ, अदेव रसलीन जब,/ पसु पंछी थके मानो, डारि दई मारि के./ यातें बिधि मेरे जान, सेस कों न दीन्हों कान,/ सेस तन तान दीन्हों, धरती को डारि के। (रस प्रबोध, 98) 

[9] भादों के दिन कठिन बिन जादव मोहि बेहाइ।/ तापै छनदा की तड़ित छिन छिन दागति आइ। (रस प्रबोध, 1033) 

[10] रावण के हैं दस बदन, और बीस हैं बाँह।/ यह सुनि कै हिय मै, कछू भयो राम दल माँह॥ रसलीन ग्रंथावली, पृ. 242 

[11] रसलीन ग्रंथावली, पृ. 61 

[12] रसलीन ग्रंथावली, पृ. 56 

[13] नूर इलाह तें अव्वल नूर मुहम्मद को प्रगट्यो सुभ आई।/ पाछें भये तिहुंलोक जहाँ लग ऊसब सृष्टि जो दृष्टि दिखाई।/ आदि दलील को अंत की है रसलीन जो बात भई पुनि पाई।/ तौ लौं न पावै इलाही कों कैसेहूं जौ लौं मुहम्मद में न समाई। (रसलीन, फुटकल कवित्त और स्फुट दोहे) 

[14] बिस्नु जू के पग तें निकसि संभु सीस बसि,/ भगीरथ तप तें कृपा करी जहाँ पैं।/ पतिततन तारिबे की रीति तेरी एरी गंग,/ पाइ रसलीन इन्ह तेरेई प्रमाण पैं।/ कालिमा कलिंदी सुरसती अरुनाई दाऊ,/ मेटि-मेटि कीन्हैं सेत आपने विधान पैं।/ त्यों ही तमोगुन रजोगुन सब जगत के,/ करिके सतोगुन चढ़ावत बिमान पैं॥ (रसलीन, फुटकल कवित्त और स्फुट दोहे) 

[15] रस प्रबोध, 87 

[16] अलह नाम छबि देत यौं ग्रंथन के सिर आइ।/ ज्यों राजन के मुकुट तें अति सोभा सरसाइ।/ अलख अनादि अनंत नित पावन प्रभु करतार।/ जग को सिरजनहार अरु दाता सुखद अपार।/ रम्यौ सबनि मैं अरु रह्यौ न्योरा आपु बनाइ।/ याते चकित भये सबै लह्यौ न काहू जाइ।/ जब काहू नहिं लहि पायो कीन्हौं कोटि विचार।/ तब याहि गुन ते धर्यौ अलह नाम संसार। (रस प्रबोध, 4) 

[17] रसलीन ग्रंथावली, पृ. 85 

[18] री दामिनी घनस्याम मिली कत मो सनमुख आइ।/ हनन लगी है सौति लौं अपनो चटक दिखाइ॥ (रसलीन ग्रंथावली, कविता भाग, पृ. 192) 

[19] सागर दच्छिन दुहुन की सम बरनत हैं प्रीति।/ वह नदियन यह तियन सो मिलात एक ही रीति॥ (रसलीन ग्रंथवाली, कविता भाग, पृ. 102) 

[20] आज छठी की रात रहस रहस सब आन जगायो।/ रंग उपजायो धूम मचायो आपने चाव मेन मंगल गायों॥ (रसलीन, फुटकल कवित्त और स्फुट दोहे, 94) 

[21] यह लछमन घर आये।/ रहस रहस सब मिली गावौ आनंद बढ़ाये॥ (वही, 92) 

[22] लाज भरी समधिन सुनि के अति समधि के मन भाए,/ रहस खेल रस रेल करन कों सुभ दिन न्योत बुलाए। (वही, 89) 

[23] आप ही लाग लगाइ दृग फिरे रोवति यहि भाइ।/ जैसे आगि लगाइ कोउ जल छिरकत है आइ।। (रस प्रबोध, वियोग शृंगार, 957)/ हिये मटुकिया माहि मथि दीठि रई सो ग्वारि।/ मो मन माखन लै गई देह दही सो डारि॥ (रस प्रबोध, वियोग शृंगार, 958) 

[24] हम तुम दाऊ एक हैं समुझि लेहु मन माँहि।/ मान भेद को मूल है भूलि कीजिये नाहि॥ (रस प्रबोध, वियोग शृंगार, सामोपाय उदाहरण, 968)