गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

छत्तीसगढ़ की भाषाओं का व्यापक सर्वेक्षण

 भाषा सर्वेक्षणलेखक : डॉ. रामनिवास साहूपृष्ठ : 278/
 
मूल्य : रु. 85संस्करण : 2017, द्वितीय संस्करण
प्रकाशक : आलेख प्रकाशन, दिल्ली  
भारत के एक राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ को मान्यता प्राप्त हुए कुछ ही वर्ष हुए हैं. परंतु यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक संपदा के साथ-साथ भाषा संपदा के लिए भी लंबे समय से जिज्ञासा और शोध का क्षेत्र रहा है. यहाँ हिंदी के साथ विभिन्न वनवासी जनजातीय समुदायों में मुंडा भाषाएँ प्रचलित हैं जिनके भीतर 9 अलग-अलग मातृभाषाएँ आती हैं. जैसे-जैसे आधुनिक विकास वहाँ पहुँच रहा है, वैसे-वैसे ये समुदाय जल-जंगल-जमीन से बेदखल होते जा रहे हैं. इस विस्थापन की कड़ी मार मातृभाषाओं के रूप में प्रयुक्त इन मुंडा भाषाओं पर रही है और तेजी से ये सभी लुप्त होने के कगार पर पहुँच रही हैं. ऐसी स्थिति में भाषावैज्ञानिकों से लेकर समाजशास्त्रियों तक की रुचि इन भाषाओं के प्रति बढ़ गई है. इस दिशा में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा से संबद्ध डॉ. रामनिवास साहू की पुस्तक ‘भाषा सर्वेक्षण’ (2017) एक ताजा प्रयास के रूप में सामने आई है. 

डॉ. रामनिवास साहू ने इस पुस्तक के माध्यम से भाषा सर्वेक्षण के चुनौतीपूर्ण कार्य को एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र - छत्तीसगढ़ - में फैली हुई 9 मुंडा भाषाओं (खरिया, महतो, माझी, कोरवा, मुंडारी, बिरहोड़, तूरी, ब्रिजिआ और कोड़ाकु) के संदर्भ में अत्यंत श्रमपूर्वक संपन्न किया है. मुंडा आदि 9 भाषाओं का यह सर्वेक्षण भाषाविज्ञान के अध्येताओं के अलावा सामान्य पाठकों के लिए भी अत्यंत रोचक है तथा इन भाषाओं से जुड़ी जिज्ञासाओं का समाधान करने के अलावा कई भ्रांतियों को दूर करने की दृष्टि से भी उपयोगी है।

लेखक ने छत्तीसगढ़ की मुंडा भाषाओं के इस सर्वेक्षण के अपने अनुभवों को भी रोचक ढंग से कलमबद्ध किया है. वे बताते हैं कि अपने क्षेत्र-कार्य के दौरान प्रथम सोपान में जहाँ ‘चिरई-झुंझ’ जैसे अगम्य वनों के झुरमुटों में फँसा था, वहीं द्वितीय सोपान में रायगढ़ जिले के उत्तर-पूर्वांचल स्थित जशपुरनगर की मनोरम्य भूमि एवं पश्चिमोत्तरांचल स्थित कैलाश-नाथेश्वर गुफा की वन-वसुधा का दर्शन भी हुआ. इसी तरह अंतिम सोपान में चुटईपाट के शीर्ष तक पहुँच कर विभिन्न पहाडियों से ठिठोली करने का भी अवसर प्राप्त हुआ. सर्वेक्षण के दौरान पहाड़ और जंगल के गाँवों में लेखक ने भूख का मारक अनुभव भी पाया. साखो ग्राम में एक रात लेखक दर-दर भटकता फिरा; किंतु एक पसर भर (पाव भर) चावल तक नहीं मिला, जिससे रात आँतें मरोड़ बिताई, फिर अगले दिन ग्यारह कि.मी. दूर जाने पर अमेरबहार ग्राम में चावल मिला और सब्जी के नाम पर एक तो कच्चे आम की चटनी मिली, फिर नमक की डली. शयन के लिए तो सर्वत्र झड़ा हुआ भू-खंड मिलता, जहाँ दरी बिछाते ही शयन-स्थल का चयन हो जाता अथवा कहीं धान का पुआल मिल जाता तो वही गद्दीनुमा बिस्तर बन जाता. साखो ग्राम में तो ग्रीष्मावकाश होने के कारण नदी की रेत पर लेखक ने रात बिताई.

कुल मिलाकर यह एक रोचक और ज्ञानवर्धक ग्रंथ है. 

समाज और संस्कृति के फलक पर छत्तीसगढ़ का ‘भाषा सर्वेक्षण’

भाषा सर्वेक्षण/ लेखक : डॉ. रामनिवास साहू/ पृष्ठ : 278/ 
मूल्य : रु. 85/ संस्करण : 2017, द्वितीय संस्करण/
 प्रकाशक : आलेख प्रकाशन, दिल्ली 

भाषा और भाषाविज्ञान को आम तौर पर कठिन और रसहीन विषय माना जाता है। इनका नाम सुनते ही छात्र और शोधार्थियों की तो हालत ही खराब हो जाती है। इस काल्पनिक भय का कारण विषय की आधारभूत संकल्पनाओं की जानकारी के अभाव में निहित है। यदि यह गाँठ खुल जाए तो भाषा अध्ययन अत्यंत रोचक विषय प्रतीत होता है। 

डॉ. रामनिवास साहू (1954) का भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के अनुदान से प्रकाशित ग्रंथ ‘भाषा सर्वेक्षण’ (2017, द्वितीय संस्करण) इसका जीवंत प्रमाण है। इस 278 पृष्ठों की शोधपरक कृति में छत्तीसगढ़ में प्रचलित मुंडा भाषाओं का भाषावैज्ञानिक पद्धति के अनुरूप सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया है। इस सर्वेक्षण के लिए उन्होंने क्षेत्रकार्य को आधार बनाया है।

भारत जैसे बहुभाषिक एवं बहुसांस्कृतिक देश में अनेक भाषायी कोड विद्यमान हैं। अलग-अलग सामाजिक बोलियाँ और क्षेत्रीय बोलियाँ (regional dialects) हैं जिनके भीतर भी विभिन्न विकल्प (variations) प्राप्त होते हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो क्षेत्रीय बोलियाँ बहुत ही संपन्न होती हैं तथा इनके सारे सांस्कृतिक तत्व जन जीवन के साथ विकसित होते हैं। ये सांस्कृतिक तत्व ही संबंधित समुदाय की भाषिक संस्कृति का गठन करते हैं। 

यह भी देखा जा सकता है कि हर व्यक्ति की बोली एक-दूसरे से भिन्न है। किसी बोली या भाषा के जितने बोलने वाले होते हैं उसकी उतनी ही व्यक्तिबोलियाँ होती हैं। विभिन्न भाषाविदों ने इन बोलियों एवं भाषाओं का सर्वेक्षण प्रस्तुत किया है। भारतीय भाषाओं के सर्वेक्षण का सर्वप्रथम प्रयास 1030ई. में अलबरूनी ने किया था। आगे चलकर 1888 से 1903 तक 15 वर्षों की अवधि में जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने भारतवर्ष के भाषा सर्वेक्षण का कार्य किया जो 21 जिल्दों में प्रकाशित है – ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ नाम से। इसमें भारत की 179 भाषाओं और 544 बोलियों का सविस्तार सर्वेक्षण शामिल है। साथ ही भाषाविज्ञान और व्याकरण संबंधी सामग्री भी। 

डॉ. रामनिवास साहू ने विवेच्य ग्रंथ के माध्यम से भाषा सर्वेक्षण के इस चुनौतीपूर्ण कार्य को एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र के संदर्भ में आगे बढ़ाने वाला कार्य किया है। इस ग्रंथ में छत्तीसगढ़ में फैली हुई 9 मुंडा भाषाओं (खरिया, महतो, माझी, कोरवा, मुंडारी, बिरहोड़, तूरी, ब्रिजिआ और कोड़ाकु) का सर्वेक्षण, वर्गीकरण, विश्लेषण तथा तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इस अत्यंत श्रमसाध्य कार्य में, कितने वर्ष लगे वे ही बता सकते हैं। 

मुंडा आदि 9 भाषाओं का यह सर्वेक्षण भाषाविज्ञान के अध्येताओं के अलावा सामान्य पाठकों के लिए भी अत्यंत रोचक है तथा इन भषाओं से जुड़ी जिज्ञासाओं का समाधान करने के अलावा कई भ्रांतियों को दूर करने की दृष्टि से भी उपयोगी है। अतः इस पुस्तक को बार-बार पढ़ने पर भी फिर से पढ़ने की इच्छा होती है विषय को गहराई से जानने के लिए। 

विवेच्य पुस्तक ‘भाषा सर्वेक्षण’ में चार खंड हैं। ‘भूमिका’ शीर्षक प्रथम खंड में भाषा सर्वेक्षण के पूर्वकार्य को प्रस्तुत किया गया है। साथ ही भारतवर्ष के मुंडा भाषी क्षेत्र, छत्तीसगढ़ के भाषापरिवार एवं मुंडा भाषाओं का परिचय तथा मुंडा भाषियों का नृतात्विक परिचय भी समाहित है। ‘भाषा सर्वेक्षण’ शीर्षक दूसरे खंड में छत्तीसगढ़ की मुंडा भाषाओं का सर्वेक्षण है। इस खंड में लेखक ने सर्वेक्षण के लिए प्रयुक्त कार्यपद्धति, सर्वेक्षण के दौरान उनके अनुभव, मुंडा भाषियों के समुदायों की जानकारी, सर्वेक्षण की कसौटियाँ, विविध बोली क्षेत्रों का विवेचन प्रस्तुत किया है। ‘विश्लेषण’ शीर्षक तीसरे खंड में सर्वेक्षण के आधार पर संकलित सामग्री का विश्लेषण भाषिक इकाइयों के आधार पर किया गया है। चौथे खंड में ग्रियर्सन और सुधिभूषण भट्टाचार्य आदि की पूर्वसामग्रियों का पुनर्मूल्यांकन प्रस्तुत करते हुए डॉ. साहू ने यह प्रतिपादित किया है कि “कालक्रमानुसार अन्य भाषाओं का व्यापक प्रभाव इन पर (मुंडा भाषाओं पर) पड़ा है, फलतः आर्य भाषापरिवार की क्षेत्रीय मातृभाषाओं के तत्व इनमें समाहित होते गए हैं।“ (पृ. 226)। इस खंड में उन्होंने मुंडा भाषा परिवार की समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए यह चिंता वक्त की है कि मुंडा भाषापरिवार की समस्त मातृभाषाएँ संकटग्रस्त हैं, अधिकांश मरणासन्न हैं। यदि इनके संरक्षण हेतु कदम नहीं उठाया गया तो ये मातृभाषाएँ विलुप्त हो जाएँगी। विद्वान लेखक ने इस क्षेत्रकार्य में सम्मिलित शब्द एवं वाक्य इकाइयों की सूची प्रस्तुत तथा सर्वेक्षित मुंडा भाषाओं का शब्दस्तरीय तुलनात्मक अध्ययन दो अत्यंत उपादेय परिशिष्टों के रूप में प्रस्तुत किया है।

मुंडा समुदायों की संस्कृति :-
इस पुस्तक की पठनीयता और उपयोगिता इसमें शामिल मुंडा भाषियों की संस्कृति के परिचय के कारण और भी बढ़ गई है। लेखक ने यह जानकारी दी है कि मुंडा भाषी समुदायों के सभी वर्गों में पितृसत्तात्मक पारिवारिक व्यवस्था मिलती है। उनके अनुसार, मुंडा भाषियों के सभी समुदायों में बहुपत्नी विवाह स्वीकृत है, लेकिन इस विवाह पद्धति के भी नियम हैं – जैसे पत्नी के बांझ हो जाने, या उसकी मृत्यु हो जाने अथवा किसी परपुरुष के साथ भाग जाने की स्थिति में ही कोई पुरुष दूसरा विवाह कर सकता है। मुंडा समुदायों में विधवा विवाह की व्यवस्था भी है। तूरी, बिरहोड एवं मुंडा समुदायों में विधवा विवाह स्वीकृत है लेकिन खरिया, ब्रिजिआ, महतो एवं माझी में विधवा को शेष जीवन मायके में ही व्यतीत करना होता है। कोड़ाकु तथा कोरवा समुदायों में विधवा विवाह को सामाजिक व्यवस्था का उल्लंघन माना जाता है तथा अर्थदंड के साथ-साथ सामाजिक भोज देने के बाद ही ऐसे स्त्री-पुरुष को समुदाय में शामिल किया जा सकता है। 

यह ग्रंथ मुंडाभाषी समुदायों की विवाह प्रणाली के बारे में भी रोचक जानकारी देता है। खरिया, तूरी, ब्रिजिआ, महतो, माझी जैसे कुछ समुदायों में विवाह प्रणाली निम्नवर्गीय हिंदुओं जैसी ही है। कुछ ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके मुंडा भाषियों की विवाह प्रणाली भिन्न है। बिरहोड़ समुदाय में जब लड़के का जन्म होता है, तो सारे परिवार के सदस्यों का ध्यान उसकी ‘दुल्हन’ लाने की सभी शर्तों को पूरा करने हेतु केंद्रित हो जाता है। तब से ही परिवार के पारिश्रमिक का कुछ अंश उसकी आवश्यकता पूर्ति हेतु संचित होता रहता है। उस लड़के के “युवा होने तक ‘वधू मूल्य’ चुकाने, ‘बेंदरा झोर’ बाँटने, ‘कर्मानाचा’ का निमंत्रण देने हेतु संचित राशि जब पूर्ण नहीं हो पाती, तब शेष धन जुटाने की अपेक्षा में ‘बंधक मजदूरी’ करनी पड़ जाती है।“ (पृ. 50)। विवाह के बाद वर पक्ष की ओर से वधू को लेने आए बारातियों एवं स्वजातियों को दिया जाने वाला सहभोज है ‘बेंदरा झोर’। बंदरों का मांस खिलाना एवं सूप बाँटना इसकी विशेषता है। ‘कर्मानाचा’ ऐसी सांस्कृतिक पद्धति है जहाँ विवाहोपरांत गौना लाने के समय का सहभोज है. इसमें तीन, पाँच अथवा सात दिनों तक सामूहिक नृत्य का निमंत्रण शामिल होता है। इस अवसर पर वर-वधू के समक्ष जीवन के हर पहलू की व्याख्या की जाती है। 

बिरहोड़ समुदाय में संयुक्त परिवार व्यवस्था पाई जाती है। खरिया, तूरी, ब्रिजिआ, मुंडा आदि समुदायों में माता-पिता द्वारा विवाह संपन्न किए जाते हैं जबकि कोड़ाकु, कोरवा, महतो, माझी समुदायों में युवक-युवतियों को वर-वधू चुनने की स्वतंत्रता होती है। कोडाकु समुदाय में ‘शूंदो’ प्रथा (युवा सम्मेलन) का आयोजन किया जाता है जहाँ युवक-युवतियों को मनपसंद जोड़ी चुनने की स्वतंत्रता रहती है। 

मुंडा भाषाओं का भाषिक विश्लेषण :-
प्रत्येक समाज में अनेक भाषाएँ और बोलियाँ होती हैं। एक ही क्षेत्र में प्रत्येक समाज की अलग-अलग बोली हो सकती है। प्रत्येक भाषा/ बोली किसी न किसी अन्य भाषा/बोली से जहाँ कुछ बिंदुओं पर समानता रखती है, वहीं उनमें कुछ संरचनात्मक असमानताएँ भी प्राप्त होती हैं। दो भाषाओं व बोलियों के बीच निहित असमान बिंदुओं को उद्घाटित करने में व्यतिरेकी विश्लेषण सहायक होता है। लेखक ने विवेच्य ग्रंथ के 146 पृष्ठों वाले तीसरे खंड में मुंडा भाषा परिवार की नौ मातृभाषाओं का व्यतिरेकी विश्लेषण प्रस्तुत किया है जिसमें स्वनिमिक, रूप, रूपस्वन तथा शब्द स्तरीय विश्लेषण शामिल है। 

स्वनिमिक विश्लेषण :-

यह विश्लेषण उच्चरित एवं कथ्य सामग्री पर आधारित है। स्वर और व्यंजन ध्वनियों का विश्लेषण करके लेखक ने यह सिद्ध किया है कि (1) मुंडा भाषाओं में तीन स्वर (इ, उ तथा आ) अत्यधिक सशक्त हैं, (2) मुंडा भाषाओं में अघोष-सघोष के भेद विरोधी युग्म के कारण बनते हैं, (3) कुछ वर्गों की ध्वनियों में अल्पप्राण और महाप्राण के आधार पर भेद विद्यमान हैं, (4) उच्चारण की कठिनाई के कारण मुंडा भाषाओं में सह-व्यंजन युक्त शब्द लुप्त हो रहे हैं, (5) मुंडा भाषाओं में सुर वाक्य स्तर पर अनुतान का भाग होता है, (6) प्रत्येक अक्षर पर बलाघात की कोई न कोई मात्रा पड़ती है, (7) द्वित्व अक्षरों के बाद दीर्घता विद्यमान रहती है, (7) स्वर अपना अस्तित्व खोए बिना ही द्वयाक्षरिक तथा बड़े शब्दों में स्वर संयोग स्थापित करते हैं (पृ. 105-106)।

रूप स्तरीय विश्लेषण :-
रूप स्तरीय अध्ययन में यह ध्यान रखा गया है कि “रूपिम मुंडा भाषा के परिप्रेक्ष्य में न होकर समस्त मातृभाषाओं की अपनी-अपनी सीमा परिप्रेक्ष्य में हो.” (पृ. 147). संज्ञा, लिंग, वचन, कारक, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, काल एवं योजक शब्दों का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि (1) मुंडा भाषाएँ अश्लिष्ट योगात्मक प्रकृति की हैं. अतः इनमें अर्थतत्व और संबंधतत्व के योग होने पर भी दोनों का अस्तित्व स्पष्ट दिखाई देता है, (2) सर्वेक्षित मुंडा भाषाओं में आदि, मध्य एवं अंत्य तीनों प्रकार के प्रत्यय मिलते हैं, (3) मुंडा भाषाओं में संज्ञा या तो रूढ़ होती है अथवा यौगिक. समस्त संज्ञा पदों में कारक, वचन और लिंग के प्रत्यय संयोग से यौगिक संज्ञा रूपायित होती है, (4) मुंडा भाषाओं में तीन प्रकार के लिंग हैं – स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसकलिंग – जो शब्दों के अर्थ पर आधारित हैं, (5) तीन प्रकार के वचन हैं – एकवचन, द्विवचन और बहुवचन, (6) कारक विधान सरल है. कर्ता और कर्म कारक की अभिव्यक्ति अर्थपरक होती है, (7) पाँच प्रकार के सर्वनाम होते हैं – पुरुषवाचक, निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक, संबंधवाचक और प्रश्नवाचक. (पृ. 147-213). साथ ही विवेचित मुंडाभाषाओं का रूपस्वनिम विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया है. यह स्पष्ट किया गया है कि “मुंडा भाषाओं में रूपस्वनिमिक (स्वनिम एवं रूपिम के बीच की स्थिति) परिवर्तन यदाकदा ही संभावित होता है. सामान्यतया प्रत्यय-संयोग के बिंदु पर यह घटित होता है.” (पृ. 216).

शब्द स्तरीय विश्लेषण :- 
मुंडा भाषाओं में प्राप्त शब्दों को लेखक ने दो प्रकारों में विभाजित किया है – (1) आकर और (2) आदत्त (आगत). आगत शब्दों के स्रोत हैं हिंदी और अंग्रेजी. वे बताते हैं कि मुंडा भाषाओं के आकर शब्द विशेष संपन्न न होते हुए भी मुंडा जन ने अपने सरल एवं परंपरागत जीवन की गतिविधियों को अभिव्यक्त करने हेतु पूर्णतः सक्षम शब्दों को गढ़ने में कोई कमी नहीं की है. ऐसे शब्दों में प्रगतिशीलता और सजीवता भी है. संपर्क का दायरा बढ़ने के साथ ही ये आगत शब्दों की सहायता से अपने शब्द भंडार को वैभवयुक्त बनाते चले जा रहे हैं. (पृ. 218). 

ग्रंथ के मूल्यांकन संबंधी खंड में लेखक ने ध्यान दिलाया है कि मुंडा भाषाएँ संकटग्रस्त और मरणासन्न भाषाएँ हैं क्योंकि इनके प्रयोक्ता समुदायों को आधुनिक जीवनधारा से जुड़ने के लिए जंगल और जमीन से विस्थापित होना पड़ रहा है. इस विस्थापन के मातृभाषाओं पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को लेखक ने एक समस्या क्षेत्र की भाँति पाठक समाज के सामने प्रस्तुत किया है. इस प्रकार यह ग्रंथ केवल भाषाविज्ञान ही नहीं, नृवंशविज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र की दृष्टि से भी पर्याप्त विचारणीय सामग्री से परिपूर्ण है. 

रविवार, 3 दिसंबर 2017

दिनकर की उर्वशी पर पुराणों का प्रभाव

डॉ. सुनीति/ दिनकर की उर्वशी : स्रोत एवं मौलिक उद्भावना (2017)
 मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/ मूल्य : रु. 600/ पृष्ठ 394



“रक्त बुद्धि से अधिक बली है और अधिक ज्ञानी भी, 
क्योंकि बुद्धि सोचती और शोणित अनुभव करता है।“ (उर्वशी, पृ. 45-46) 

इस उद्घोष पर आधारित काव्य रूपक ‘उर्वशी’ पुराण प्रसिद्ध उर्वशी और पुरुरवा की कथा पर आधारित है। दिनकर की इस रचना पर अनेक समीक्षात्मक कृतियाँ उपलब्ध हैं। यही नहीं, हैदराबाद शहर को यह श्रेय भी प्राप्त है कि यहाँ से निकलने वाली अद्वितीय पत्रिका ‘कल्पना’ ने अपने 4 अंकों में उर्वशी और उससे जुड़े विवाद पर धारावाहिक सामग्री प्रकाशित की थी. आज लोकार्पित हो रही डॉ. सुनीति की शोधपूर्ण कृति ‘दिनकर की उर्वशी : स्रोत एवं मौलिक उद्भावना’ (2017) इस चर्चा को एक नया आयाम देने वाली कृति है. 

लेखिका ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक दिनकर की ‘उर्वशी’ के स्रोत और कवि की मौलिक उद्भावनाओं को रेखांकित किया है। आमुख में लेखिका ने स्वयं इस बात को स्पष्ट किया है कि “नारी के विविध रूपों का समन्वय एवं उसके ममता से भरे भावों को जिस अनोखे एवं यथार्थ रूप में ‘उर्वशी’ में प्रस्तुत किया गया है, उस प्रभाव की अभिव्यक्ति ही, प्रस्तुत ग्रंथ की पृष्ठभूमि रही है।“ (आमुख)

इस शोधग्रंथ में 9 अध्याय हैं। पहले अध्याय में वेदों में निहित उर्वशी-पुरुरवा की कहानी को रेखांकित करते हुए लेखिका कहती हैं कि वेदों में उर्वशी आख्यान सृष्टि विद्या के वैज्ञानिक तथ्य को प्रकट करने वाला आख्यान प्रतीत होता है। आगे तीन अध्यायों में उन्होंने क्रमशः उर्वशी के पौराणिक स्वरूप, संस्कृत साहित्य में निहित उर्वशी की कथा तथा कवींद्र रवींद्र, योगिराज अरविंद और जयशंकर प्रसाद के साहित्य में प्रस्तुत उर्वशी के रूपों का मूल्यांकन करते हुए यह प्रतिपादित किया है कि “पौराणिक काव्यों में फैला हुआ उर्वशी का कथानक आधुनिक युग में भी अपनी सरसता को लिए विविध रूप में अपना सौंदर्य बिखेर रहा है। इन सभी बिखरे रूपों का एक उत्कृष्टतम रूप दिनकर की उर्वशी में सहज ही प्रतिभासित होता है।“ (पृ. 185)। आगे के 5 अध्यायों में डॉ. सुनीति ने दिनकर की ‘उर्वशी’ की कथावस्तु, चरित्र चित्रण, दार्शनिक रूप, काम और मनोविज्ञान के सामंजस्य आदि को रेखांकित करते हुए प्रतिपादित किया है कि ‘उर्वशी’ एक ऐसा काव्य है जो रस से रहस्य में प्रवेश करता है और काम के द्वारा मोक्ष का द्वार खटखटाता है। लेखिका यह भी कहती हैं कि “युगों-युगों तक ‘उर्वशी’ महाकाव्य, नर-नारी की चिरंतन कामगत समस्याओं को सुलझाता, जीवन को सँवारता, मानव में उस अद्भुत शक्ति का संचरण करेगा, जिससे कि मानव अपने मूलभूत गुणों के कारण गौरवान्वित हो सके.” (पृ. 388) 

यों तो इस ग्रंथ के सभी अध्याय अत्यंत गहन हैं जिन्हें बार-बार पढ़े जाने की जरूरत है। लेकिन अध्याय 2 जिसका शीर्षक ‘उर्वशी का पौराणिक स्वरूप’ है, खास तौर पर ध्यान खींचता है। इस अध्याय में भारतीय पौराणिक वाङ्मय में उर्वशी-पुरुरवा के आख्यान का अत्यंत रोचक अनुशीलन किया गया है। वास्तव में उर्वशी और पुरुरवा की कहानी दुनिया की सबसे पुरानी प्रेम कहानी है जिसमें अप्सरा और मनुष्य का प्रणय दर्शाया गया है। यह कहानी ऋग्वेद से चलकर पुराणों और कालिदास के ‘विक्रमोर्वशीयम’ से होती हुई दिनकर के काव्य रूपक ‘उर्वशी’ तक पहुँचती है। इस अध्याय में लेखिका ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला है कि दिनकर ने पुराणों में वर्णित उर्वशी-पुरुरवा के कथानक को अंशतः ही ग्रहण किया है क्योंकि उर्वशी द्वारा तीन शर्तें रखना, मेषों का अपहरण, गंधर्वों का वरदान आदि अनेक घटनाओं को दिनकर ने छुआ तक नहीं है। डॉ. सुनीति को लिखे हुए पत्र में दिनकर ने स्वयं इस बात को स्पष्ट किया है कि महर्षि अरविंद ने उर्वशी को आत्मा के आध्यात्मिक उद्देश्य के रूप में चित्रित किया है। जब उर्वशी चली जाती है तो पुरुरवा उसे खोजता हुआ हिमालय की घाटियों में भटकता फिरता है। भरत के शाप को दिनकर उर्वशी के चले जाने का कारण मानते हैं। दिनकर की दृष्टि में पुरुरवा सनातन नर का प्रतीक है और उर्वशी सनातन नारी का। उन्होंने ‘उर्वशी’ की भूमिका में इस बात को रेखांकित किया है कि वैदिक आख्यान की पुनरावृत्ति अथवा वैदिक प्रसंग का प्रत्यावर्तन उनका ध्येय नहीं है। (उर्वशी, भूमिका)

इस दूसरे अध्याय का सबसे बड़ा महत्व यही है कि दिनकर की उर्वशी के परंपरागत स्वरूप और आधुनिक उद्भावनाओं को इस चाभी के बिना खोला नहीं जा सकता।

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

प्रवासी कथाकार देवी नागरानी की मूल्य चेतना

अविभाजित भारत के कराची में ईस्वी सन 1941 में जन्मी देवी नागरानी मूलतः सिंधीभाषी प्रवासी हिंदी साहित्यकार हैं. उनके परिवार को 1947 में विभाजन की त्रासदी के कारण विस्थापित होना पड़ा जो अनेक पड़ावों को पार करते हुए दक्षिण भारत में हैदराबाद में बस गया. वहीं स्कूल और कॉलेज स्तर की शिक्षा प्राप्त की. फिर अध्यापन से जुड़ गईं - पहले मुंबई, फिर शिकागो और अंत में न्यू जर्सी. देवी नागरानी ने जिंदगी के हर मोड पर कुछ न कुछ सीखा है. वे हर नए अनुभव को नया जन्म मानने वाली लेखिका हैं. उन्होंने जीवनानुभवों की रोशनी में अपने भीतर की सृजनात्मक शक्ति को पहचाना. अलग-अलग पडावों के बसने-उखाड़ने-फिर बसने की जद्दोजहद के दौरान ‘’कुछ सीखा कुछ सिखाया – कुछ के लिए मायस्त्रा (मास्टरनी) बनी, कुछ मेरे गुरु बन गए.” (ई-कल्पना). और इस तरह देवी नागरानी शिक्षक के रूप में न्यू जर्सी के विद्यार्थियों को हिंदी भाषा के साथ-साथ भारतीय दर्शन और संस्कृति से भी परिचित कराने लगीं. 

देवी नागरानी का व्यक्तित्व सौम्य है. वे मृदुभाषी हैं और उनकी सोच सकारात्मक. उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं दीखता. हर पड़ाव पर जो अनुभव प्राप्त किए उन्हें अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने साहित्य को माध्यम बनाया. इस संदर्भ में उनका यह मत उल्लेखनीय है – “1972 से टीचर होने के नाते पढ़ती-पढ़ाती रही हूँ और सही मायनों में जिंदगी की किताब के पन्ने नित नए मुझे एक नया सबक पढ़ा जाते हैं. कलम तो मात्र एक जरिया है, अपने अंदर की भावनाओं को भी समुद्र की गहराइयों से ऊपर सतह पर लाने का. इसे मैं रब की देन मानती हूँ, शायद इसलिए, जब हमारे पास कोई नहीं होता तो यह सहारा लिखने का एक साथी बनकर रहनुमा बन जाता है.” (वही). 

यों तो देवी नागरानी की सबसे प्रिय विधा गज़ल है. सिंधी और हिंदी में उनके कई मौलिक गज़ल संग्रह प्रकाशित हैं. ‘चरागे-ए-दिल,’ ‘दिल से दिल तक,’ ‘लौ दर्दे दिल की,’ ‘दीवाने-ए-दिल से,’ ‘सहन-ए-दिल मंजरे आम पर होगा’ आदि हिंदी गज़ल संग्रह हैं तो ‘गम में भोगी खुशी,’ ‘गज़ल’ और ‘आस की शम्अ’ आदि सिंधी के. गज़ल को वे अपनी सखी मानती हैं और कहती हैं, “कलम मेरी तन्हाइयों का साथी और गज़ल मेरी सखी! इनके संग सफर करते मेरे भीतर की नारी ने थपेड़े झेलने के बाद बसना, निखरना और महकना सीख लिया है. अब कभी गद्य लिखना शुरू करती हूँ तो पद्य का स्वरूप उसमें झाँकता हुआ नज़र आता है. यह भी लेखन कला का एक अंश है.”(वही). लेकिन कहानी लिखने में भी उनका मन खूब रमता है. सिंधी में लिखी हुई अपनी मौलिक कहानियों का हिंदी में तथा हिंदी की कहानियोँ का सिंधी में वे स्वयं अनुवाद करती हैं. वे अनेक संस्थानों एवं संगठनों द्वारा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों तथा पुरस्कारों से भी सम्मानित एवं पुरस्कृत हो चुकी हैं. 

देवी नागरानी साहित्य की सामाजिक प्रयोजनीयता की पक्षधर हैं. वे उस साहित्य को उत्कृष्ट मानती हैं जो जीवन पथ पर आती-जाती हर क्रिया को पहचानने में पाठक की मदद कर सके और साथ ही उसके भीतर उचित-अनुचित का विवेक जगा सके. उनके अनुसार साहित्यकार का उद्देश्य यह भी होता है कि अपनी लेखनी के माध्यम से पाठकों को भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने के लिए बाध्य करे तथा उच्च मूल्यों को स्थापित करे. वे साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने की हिमायती हैं. उनकी यह मनुष्यकेंद्रित मूल्य दृष्टि उनकी कहानियों में भी गुंथी हुई है जो एक प्रवासी भारतीय साहित्यकार की भारतीय मूल्यों के प्रति सजगता का जीवंत प्रमाण है. स्पष्ट है कि साहित्यकार तो प्रवासी हो सकता है लेकिन साहित्य नहीं. न्यू जर्सी में रहते हुए भी देवी नागरानी का मन भारतीय है. उनकी कहानियों में पाश्चात्य एवं भारतीय परिवेश का द्वंद्व तो है ही, साथ ही भारतीय जीवन दर्शन और भारतीय संस्कृति विद्यमान है. 

देवी नागरानी की लघुकथओँ और कहानियों को पढ़ने से पता चलता है कि वे अपने परिचित परिवेश से विषयवस्तु का चयन करती हैं तथा तदनुरूप पात्रों का सृजन करती हैं. उनकी हर कहानी मूल्यकेंद्रित है जिससे अमेरिका में बसी लेखिका के भारतीय मानस का पता मिलता है. इस मानस की जड़ें भारतीय जीवन दर्शन, अध्यात्म और मूल्यकेंद्रित भारतीय संस्कृति में निहित हैं. देवी नागरानी बार-बार इस बात को रेखांकित करती हैं कि पाठक की मानसिकता एवं समाज की उपयोगिता को दृष्टि में रखकर साहित्य का सृजन करना अनिवार्य है ताकि पाठक की बौद्धिकता का विकास हो और स्वस्थ समाज का निर्माण हो. वे भारतीय एवं पाश्चात्य परंपरा में निहित मूल्यों का समन्वय करती हैं क्योंकि पाश्चात्य परंपरा ऐहिक, सामाजिक एवं बुद्धिवादी है तो भारतीय मूल्य चिंतन आध्यात्मिक अनुभूति में निहित है. 

देवी नागरानी मानती हैं कि आज बाजारवाद ने मनुष्य को इतना प्रभावित कर दिया है कि वह बाजार के हाथों कठपुतली बनता जा रहा है. उसके लिए सब कुछ बिकाऊ है, यहाँ तक कि स्वयं मनुष्य और उसकी भावनाएँ भी. बाजारवादी मानसिकता ने स्त्रियों की स्थिति को दयनीय बना दिया है. वह केवल भोग्या बन गई है. संवेदनशील साहित्यकार स्त्री के वस्तुकरण को सह नहीं सकता. देवी नागरानी की कहानी ‘शिला’ की केंद्रीय पात्र शिला समीर के प्यार में अंधी होकर अपनी पढ़ाई छोड़कर उससे विवाह करके लेती है, लेकिन समीर तूलिका पर रंग बिखेरकर उसकी तस्वीरों को सजाता था और सुंदरता के दीवाने उन तस्वीरों को खरीदते थे. समीर को दौलत का नशा चढ़ता गया और शिला “किसी पत्थर की मूर्ति की तरह उसकी प्रेरणा बनकर घंटों उसके सामने बैठती” (देवी नागरानी (2016), शिला, ऐसा भी होता है, दिल्ली : शिलालेख, पृ. 31). समीर उसे “एक निर्जीव रंग-बिरंगी पेंटिंग समझ कर स्वार्थ की वेदी पर चढ़ाने के नए रास्ते ढूँढ़ता रहा.” (वही). देवी नागरानी स्त्री की इस स्थिति से विचलित होती हैं. वे बार-बार यह प्रश्न करती हैं कि “क्या पुरुष प्रधान समाज में औरत अपनी कोई पहचान नहीं पाती?”( नई माँ, ऐसा भी होता है, पृ. 175). वे इस बात को रेखांकित करती हैं कि स्त्री को अपनी निर्णयात्मक सोच और भावनाओं पर पूरा अधिकार होना चाहिए. 

बदलते जीवन मूल्यों के कारण स्त्री की स्थिति दयनीय होती जा रही है. इस समाज में स्त्री कहीं भी सुरक्षित नहीं है. उसको मात्र देह मानकर उसके साथ जानवरों की तरह व्यवहार किया जा रहा है. ‘खून की होली’ शीर्षक कहानी की सलोनी को कुछ दरिंदे नोचकर, कुचलकर लावारिस की तरह उसकी लाश को बेरहमी से फेंक जाते हैं. सलोनी, आयशा, आरुषी, निर्भया और न जाने कितनी लड़कियों को गिद्धों का शिकार होना पड़ेगा? देवी नागरानी पाठकों के समक्ष प्रश्न उठाती हैं कि “क्या हसीन होना अभिशाप है? क्यों सौंदर्य को कुचलकर मसला जाता है, रौंदा जाता है, फूल की तरह?” (खून की होली, ऐसा भी होता है, पृ. 81). आगे वे यह भी टिप्पणी करती हैं कि देह का सौदा करने वाले दरिंदे अपने ज़मीर को ज़िंदा कहाँ रख पाते हैं! वे यह भूल जाते हैं कि उन्हें जन्म देने वाली माँ भी स्त्री है. (वही, पृ. 84). प्रायः स्त्री को किसी और की गलती के कारण समाज में अपमानित होना पड़ता है, ठोकर खानी पड़ती है. गरीब स्त्री की स्थिति तो और भी सोचनीय है क्योंकि पुरुष की नजरें हर वक्त उसका पीछा करती रहती हैं. जब वह अपने अधिकारों की माँग करने लगती है तो तोहमत के सिवाय उसे कुछ हाथ नहीं लगता. ‘वसीयत’ कहानी की दुर्गावती की माँ उसे पिता का नाम दिलाने के लिए आँचल फैलाती है तो वह “वासना का दरिंदा, लफ्जों से रिश्ते तोलता रहा, तोहमत पर तोहमत लगाता रहा, पर माँ की झोली में अपने ही बच्चे के लिए पिता का नाम तक न डाल सका.” (वसीयत, ऐसा भी होता है, पृ. 74). गलती चाहे किसी की भी हो लेकिन यह संकीर्ण समाज स्त्री को ही दोषी ठहराता है, उसे ही सजा देता है.

स्त्री-सम्मान रूपी उदात्त जीवनमूल्य के क्षरण से लेखिका अत्यंत क्षुब्ध प्रतीत होती हैं. गरीबी के कारण कई लड़कियों का जीवन समय से पहले ही समाप्त हो जाता रहा है. उनके सुनहरे सपने चकनाचूर होते रहे हैं. भले ही जमींदारी प्रथा समाप्त हो चुकी है लेकिन आज भी समाज में गरीबों को कर्ज के तले दबकर बेटियों का सौदा करना पड़ रहा है. इसी बात को ‘सज़ा या रिहाई’ (पृ.66) शीर्षक कहानी में रेखांकित किया गया है. भले ही हम कह लें कि यह समय स्त्री सशक्तीकरण का समय है लेकिन इस तथ्य से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि आज भी यह समाज स्त्री को कमतर ही आँकता है. अकेली स्त्री को देखकर पुरुष भेड़िया बन जाता है. रक्षा करने के बजाय निरीह स्त्री की अस्मत को पुलिस ही दागदार बना दे तो इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है? इसी बात को ‘जंग जारी है’ (पृ. 53) शीर्षक कहानी के माध्यम से उकेरा गया है. अनेक स्त्रीवादी विमर्शकार और साहित्यकार स्त्री मुक्ति को लेकर अनेक बातें करते हैं लेकिन स्त्री मुक्ति केवल अपने शरीर पर अधिकार होने तक सीमित नहीं है. यह तो केवल प्राथमिक चीज है. असली चीज है स्त्री के मानवाधिकार. जर्मेन ग्रीयर भी यही कहती हैं कि स्त्री मुक्ति का अर्थ यदि मरदाना भूमिका अपनाना लगाया जाए तो बर्बादी के अलावा कुछ नहीं. (बधिया स्त्री, पृ. 106). मानवाधिकारों के इस संघर्ष में स्त्री-पुरुष के बीच प्रतियोगिता नहीं सद्भाव होना चाहिए. 

आज समाज में मूल्यहीनता चरम पर है. रिश्ते भी मूल्य खोते जा रहे हैं, खोखले होते जा रहे हैं. रिश्तों को जबरन निभाया नहीं जा सकता. यदि ऐसी स्थिति आ जाए तो जिंदगी बोझ बन सकती है. इस दृष्टि से ‘और मैं बड़ी हो गई’, ‘रिश्तों की उलझन’, ‘नई माँ’, ‘बेमतलब के रिश्ते’, ‘आखरी पड़ाव’, ‘सजा या रिहाई’ और ‘वसीयत’ उल्लेखनीय कहानियाँ हैं. देवी नागरानी ने इन कहानियों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि रिश्ते-नाते एक दिन में नहीं बनते, इन्हें न ही किसी पर थोपा जा सकता है और न ही जबरन निभाया जा सकता है. वे यह चिंता व्यक्त करती हैं कि आज की बाजारवादी संस्कृति के कारण “रिश्तों का टूटना और जुड़ना एक व्यावहारिक चलन-सा बन गया है.” (नई माँ, ऐसा भी होता है, पृ. 172). जो रिश्ते स्वयं को गुमराह होने से नहीं बचा पाते, ऐसे रिश्ते भावी पीढ़ी को क्या पहचान दे पाएँगे? ‘वसीयत’ शीर्षक कहानी के माध्यम से लेखिका ने यह स्पष्ट किया है कि “रिश्तों में अगर निभाने से ज्यादा झेलने तक की नौबत आ जाए, तो मुलायम रिश्तों में नागफनियाँ उग आती हैं.” (वसीयत, ऐसा भी होता है, पृ. 79) तथा “रिश्तों की बुनियाद भी एक ऐसे ही मधुर व शबनमी प्यार की मोहताज होती है, जो अपनेपन के छुहाव से आलिंगन में ले ले, जो मर्यादा की सीमाओं में रहकर घर के भीतर-बाहर सुकून भर दे, और राहत भरी दुआओं से उस आँगन को गुलशन बना दे.” (वही, पृ. 71), “जो रिश्ते भेद भाव की दलदल में धँसकर कुरूप हो जाते हैं, उनकी बदबू साँसों में घुटन पैदा कर देती है.” (आखरी पड़ाव, ऐसा भी होता है, पृ. 62). 

आज का समय मानव सभ्यता के इतिहास में अब तक का सबसे जटिल समय है. जटिल इसलिए कि रिश्ते-नातों से भी व्यापार किया जा रहा है. यहाँ तक कि माँ की ममता को भी मुनाफे की दृष्टि से ही देखा जा रहा है. जब तक माता-पिता से आर्थिक लाभ हो तब तक ही बच्चे उनकी सुन रहे हैं. माता-पिता को सिर्फ धन कमाने के यंत्र के रूप में ही देख रहे हैं. जैसे ही वृद्धावस्था दस्तक देने लगती है वैसे ही उन्हें घर की दहलीज से वृद्धाश्रमों की दहलीज तक का सफर करना पड़ता है. इस स्थिति पर आक्रोश व्यक्त करते हुए देवी नागरानी कहती हैं कि ऐसा सफर “एक कसैलेपन का स्वाद मुँह में भर देता है. उम्र भर जिस वृक्ष की शाखों से घर-आँगन फला-फूला, आज वही आधार निराधार, बिना परिचय खड़ा है. माना उम्र की पगडंडी बड़ी ही संकरी है, यह भी माना कि इस दौर और उस दौर में दरार जब चौड़ी हो जाती है तो एक गहरे खालीपन को महसूस किया जाता है. इसी फासले को पाटने के लिए ममता को स्वार्थ की ईंटों में चुनवा दिया जाता है.” (वही, पृ. 59). समाज में दिन-ब-दिन मानवता का क्षरण होता जा रहा है. पाशविकता, अमानवीयता चरम पर है. भाषा, जाति, वर्ग, संप्रदाय, नस्ल, वर्ण आदि के नाम पर केवल देश ही नहीं बँट रहा है बल्कि मानवीयता भी बँट रही है. जिंदगी बँट गई, मनुष्य बँट गया है, ममता बाँटी जा रही है, हर चीज को टुकड़ों में बाँटकर बाजार में बेचा जा रहा है. देवी नागरानी कहती हैं कि “वृद्धों को हाशिए पर ले जाने का पहला कारण है समाज में पारिवारिक संस्था के संदर्भ में सोच का बदलाव.” (वही, पृ. 64). वे यह प्रश्न करती हैं कि जहाँ दो पीढ़ियाँ एक छत के नीचे रहती हैं वहीं तीसरी बुजुर्ग पीढ़ी क्यों नहीं रह सकती? यह हर किसी को सोचना चाहिए क्योंकि वार्धक्य से कोई नहीं बच सकता. 

निःसंदेह कोई साहित्य, कोई विमर्श ऐसा मूल्य नहीं गढ़ता जिससे समाज के दो अनिवार्य वर्ग परस्पर शत्रु बन जाएँ. देवी नागरानी की कहानियों में यदि बार-बार मनुष्यता, आदमीयत, इंसानियत आदि शब्दों का प्रयोग पाया जाता है तो यह स्वाभाविक ही है. इससे यही स्पष्ट होता है कि वे मानवता को महत्व देती हैं तथा मनुष्य और मनुष्य के बीच पाशविकता को समाप्त करना चाहती है. उनके कुछ प्रयोग देखें – “आदमीयत दलों में विभाजित हो रही है, देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, जी रहे हैं, भोग रहे हैं, पर कुछ कर नहीं पा रहे हैं? (आख़री पड़ाव, ऐसा भी होता है, पृ. 63). “इंसानियत का पाठ पढ़ने वाले इंसानों के दिलों के रोशनदान खुले रहे, अँधेरा छँट गया, रोशन जमीर जगमगा उठे!” (वसीयत, ऐसा भी होता है, पृ. 80). “मानवता शायद यहीं चूक जाती है कि उनको जन्म देने वाली नारी उनके घरों की धरोहर है.” (वही, पृ. 84), “मानवता जहाँ अपने अर्थों पर पूरी नहीं उतरती शायद वहीँ जवाबदारी का अंत हो जाता है.” (घुटन भरा कोहरा, ऐसा भी होता है, पृ. 127). ‘आदमीयत/ इंसानियत/ मानवता’ और भी अनेक स्थलों पर पुनरावृत्ति से पता चलता है कि मानव-मूल्य लेखिका की चिंता का मूल विषय है. 

भारतीय संस्कृति मूलतः धर्मं और अध्यात्म केंद्रित है. धर्म और अध्यात्म का अभिप्राय यहाँ पूजापद्धति और संप्रदाय विशेष नहीं, बल्कि कर्तव्य से है जिसमें आचरण की पारदर्शिता निहित है. भौतिकतावाद अपने आकर्षण के बावजूद प्रवास में भी भारतीय मानस को अध्यात्म के संस्कार से विलग नहीं कर पाता क्योंकि “हमारे संस्कार हमारी नींव हैं जिनकी जड़ें बहुत मजबूत हैं, इसलिए आसानी से यहाँ की रोशन राहें हमें बहुत जल्दी गुमराह नहीं कर पातीं. शायद हर हिंदुस्तानी की यही प्रतिक्रया हो, क्योंकि हमारी सभ्यता, संस्कृति परिवार से शुरू होकर परिवार पर खतम होती है.” (बेमतलब के रिश्ते, ऐसा भी होता है, पृ. 22). भारतीय संस्कृति कुटुंब संस्कृति है. संयुक्त परिवारों को महत्व देती है. इसके विपरीत पाश्चात्य संस्कृति व्यक्ति केंद्रित है. भारतीय संस्कृति भोग का विरोध नहीं करती बल्कि यह संदेश देती है कि भोग में भी विवेक का होना आवश्यक है. इसीलिए विवाह संस्था को महत्व दिया जाता है और दांपत्य को जन्मों का संबंध माना जाता है. वहीँ पाश्चात्य संस्कृति में परिवार और विवाह को बंधन या अनुबंध माना जाता है जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधक सिद्ध होते हैं. विवाह के स्थान पर सहजीवन को भी वहां व्यापक स्वीकृति प्राप्त है. ‘बेमतलब के रिश्ते’ कहानी की क्रिस्टी तीन वर्षों तक अपने पुरुष-मित्र के साथ सहजीवन कायम रखती है और उसके बच्चे की माँ बन जाती है. क्रिस्टी की दोस्त रमा बच्चे के बारे में जानकर जब शादी की बात करती है तो क्रिस्टी कहती हैं, “शादी करना कोई ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, और न ही मैं यह उम्मीद रखती हूँ कि वह मेरे इस बच्चे का बाप बनता फिरे या मेरा पति होने का दावा करे. मैं आजाद हूँ, आजाद रहना चाहती हूँ, कोई नया बंधन मुझे जकड़े यह मुझे मंजूर नहीं.” (वही). रमा क्रिस्टी के इस जवाब से आहत हो जाती है क्योंकि विदेश में रहने के बावजूद रमा की सोच भारतीय ही है और वह भारत की सभ्यता-संस्कृति से गहरे जुड़ी हुई है. भारतीयों की भावनाएँ परिवार और परिवेश से जुड़ी रहती हैं. देवी नागरानी टिप्पणी करती हैं कि “आजाद देश के आजाद लोगों को हर तरह की आजादी है, पर आजादी का सही इस्तेमाल करना पाबंदी के दायरे में होता है. जंजीरों की जकड़न से आजाद होकर हम फिर भी कितने गुलाम रहते हैं, अपनी ख्वाहिशों के, अपने मन की आशाओं और आकांक्षाओं के, और इसी आजादी की कीमत भी हमें उतनी ही बड़ी चुकानी पड़ती है. आजादी का दूसरा छोर है बंधन, और बंधन की परिधि में रहकर जो आजादी हम इस्तेमाल करते हैं, चाहे वह शरीर से जुड़ी हो या मन से, वह हमारे अस्तित्व को अच्छे बुरे तजुर्बों से सजाकर परिपक्वता बख्शती है.” (वही, पृ. 23-24). पाश्चात्य संस्कृति में एक-दूसरे के पार्टनर्स को बदलने को भी गलत नहीं बल्कि फैशन और सभ्यता माना जाता है. मनोरंजन के तौर पर लोग देर रात की पार्टियों में यह सब करते ही रहते हैं. इसी बात को ‘आजादी की कीमत’ शीर्षक कहानी में उकेरा गया है. (वही, पृ. 88). 

देवी नागरानी की कहानियों में स्त्री की बेबसी, वस्तुकरण, अकेलेपन, द्वंद्व, आक्रोश, आत्मविश्वास, जिजीविषा आदि के वैविध्यपूर्ण पाठ निहित हैं तथापि इन कहानियों का केंद्रबिंदु ‘मूल्य’ है. हर सरोकार को मूल्य की दृष्टि से ही उकेरा गया है. कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं – 

(1) स्त्री की बेबसी का पाठ  
  •  उसकी मुस्कुराहट पर भी कर्फ़्यू लाफा हुआ है. (ऐसा भी होता है, पृ. 18). 
  •  चाहे-अनचाहे अहसासों के साथ जीना पड़ता है, कहीं कहीं तो अक्सर धक्के मारकर जिंदगी की गाड़ी को चलाना पड़ता है. (और मैं बड़ी हो गई, ऐसा भी होता है, पृ. 40). 
  •  माँ कुछ कह न पाई, शायद उसे हर आहट पर एक अनचाहा डर सामने आता हुआ नज़र दिखाई दे रहा है. (वही, पृ. 42).
  •  ये कहाँ का इंसाफ है कि मैं अपने बच्चे को देख नहीं सकती? देखते हुए उसे छू नहीं सकती? उसके मुलायम शरीर को महसूस नहीं कर सकती? उसे अपने आलिंगन में भर नहीं सकती, क्यों, पर क्यों? मैं उसकी माँ हूँ, मुझे ये किसी सज़ा दी जा रही है? (ममता, ऐसा भी होता है, पृ. 44). 
(2) द्वंद्व का पाठ 

  •  हादसों को अपनी जिंदगी की सार्थकता समझते हैं. इसी उलझन के दौर में जूझकर सिमटती रही दुर्गावती, ‘क्या करे और क्या न करे’ की कशमकश में खुद अपने आप से भी दूर होती रही. (वसीयत, ऐसा भी होता है, पृ. 72). 
(3) अकेलेपन का पाठ 

  • यह तन्हाई भी कितनी नीरस है जो इंसान को यादों की गहरी वादियों की अँधेरी गुफाओं में ले जाती है. (जियो और जीने दो, ऐसा भी होता है, पृ. 158)
देवी नागरानी की कथाभाषा में सूक्ति-गठन की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है. इन सूक्तियों का मूलस्वर भी मूल्यबोध से ही निःसृत है. उदाहरण के लिए: अपनेपन की रोशनी में गैरत का अँधेरा गुम हो गया (पृ. 19)/ संस्कृति आचरण की माँग करती है (पृ. 22)/ तकदीर तो पानी का एक रेला है जो बहता जाता है (पृ.24)/ नदी में उफान जब वेग पकड़ लेता है तो कौन बाँध को रोक पाता है? (पृ. 47)/ वक्त सबको सब कुछ सिखा देता है (पृ. 165)/ छत व मकान घर नहीं होते (पृ. 71) आदि. 

निष्कर्षतः, यह कहा जा सकता है कि प्रवासी कहानीकार देवी नागरानी की कहानियों में भारतीय संस्कार में रचे-पगे उदात्त मानवीय मूल्य अंतर्निहित हैं. समाज में व्याप्त अमानुषिक प्रवृत्ति के खिलाफ देवी नागरानी सरल संप्रेषणीय भाषा का व्यवहार करते हुए सुदृढ़ आवाज उठाती हैं, पाठकों को सचेत करती हैं तथा स्थितियों को सुधारने की गुहार लगाती हैं. उनकी कहानियों में विश्वबंधुत्व की भावना निहित है जिसकी जड़ें भारतीय अध्यात्म के तंतुओं से सृजित हैं. 

https://www.ekalpana.net/octbookreveiw

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

.. शरद ऋतु आई







भारतवर्ष प्रकृति का सबसे प्रिय लीलाक्षेत्र है। यहाँ वर्षा, शरद, शिशिर, हेमंत, बसंत और ग्रीष्म ऋतुओं का अपना-अपना महत्व है। आदिकालीन कवियों से लेकर समसामयिक साहित्यकारों तक ने इन ऋतुओं का मनोरम चित्रण किया है। वे प्रकृति के साथ मनुष्य के मनोभावों को जोड़कर वर्णन करते हैं तथा लोक संस्कृति को भी अभिव्यक्त करते हैं। 

'संदेश रासक' में अद्दहमाण (अब्दुल रहमान) शरद ऋतु का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु आती है खुशियाँ लेकर। आकाश वर्षा के मेघों से मुक्त होकर निर्मल हो जाता है और वायु भी शांत। रात में तारे दिखने लगते हैं। दक्षिण दिशा में अगस्त्य नक्षत्र का चमक उठना वर्षा ऋतु के बीतने और शरद ऋतु के आने का सूचक है। शरद ऋतु में चाँदनी निर्मल लगती है। साँप भी पाताल में जाकर बैठ जाते हैं। ... 

शरद ऋतु में तालाब निर्मल जल से भर जाते हैं और सौ पंखुड़ियों वाले फूलों से सुशोभित हो जाते हैं। नदियाँ प्रवाहित होने लगती हैं। ग्रीष्म ऋतु के कारण सरोवरों की जो शोभा गायब हो गई थी वह शरद के आगमन से वापस लौटती है। ...

हंस कमल का रस पीकर रसमय होने लगते हैं। प्रफुल्लित होकर आवाज करने लगते हैं। पृथ्वी कास, कमल, हरसिंगार आदि अनेक प्रकार के फूलों से भर जाती है। नदियों के तट पक्षियों के मधुर कलरव से गुंजायमान हो उठते हैं और कीचड़ के बैठ जाने के कारण अब नदी के जल में प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है। 

शरद ऋतु का राम कथा के साथ भी गहरा संबंध है। वाल्मीकि हों या तुलसी, सभी रामायणकारों ने यह उल्लेख किया है कि बाली वध के उपरांत राम ने वर्षा ऋतु एक ही जगह रहकर बिताई। इस दौरान सुग्रीव आमोद-प्रमोद में खोए रहे और शरद ऋतु आ गई। शरद के आगमन को सबसे पहले पवनपुत्र हनुमान और राम ने अनुभव किया। हनुमान ने देखा कि आकाश निर्मल हो गया है, अब न तो बादल ही दिखाई पड़ते हैं और न तो बिजली चमकती है। ऋतु परिवर्तन के इन चिह्नों को पहचानकर उन्होंने सुग्रीव को विलासिता की नींद छोड़कर सीता की खोज आरंभ करने के लिए चेताया। उनकी बात मानकर सुग्रीव ने नील को समस्त वानर सेना को तुरंत बुलाने की आज्ञा दी। दूसरी ओर राम सुग्रीव के प्रमाद के विषय में सोचकर निराश हो रहे थे। उन्हें सीता की चिंता खाए जा रही थी। शरद में परिलक्षित होने वाले परिवर्तनों की ओर ध्यान दिलाते हुए राम ने लक्ष्मण से कहा "हे लक्ष्मण! पृथ्वी को जलप्लावित कर देने वाले गरजते बादल अब शांत हो कर पलायन कर गए हैं। आकाश निर्मल हो गया है। चंद्रमा, नक्षत्र और सूर्य की प्रभा पर शरद ऋतु का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा है। हंस मानसरोवर की परित्याग कर पुनः लौट आए हैं और चक्रवातों के समान सरिता के रेतीले तटों पर क्रीड़ा कर रहे हैं। वर्षाकाल में मदोन्मत्त हो कर नृत्य करने वाले मोर अब उदास हो गए हैं। सरिता की कल-कल करती वेगमती गति अब मंद पड़ गई है मानो वे कह रही हैं कि चार दिन के यौवन पर मदोन्मत्त हो कर गर्व करना उचित नहीं है। सूर्य की किरणों ने मार्ग की कीचड़ को सुखा डाला है, इससे वे आवागमन और यातायात के लिए खुल गए हैं। राजाओं की यात्रा के दिन आ गए हैं, परंतु सुग्रीव ने न तो अब तक मेरी सुधि ली है और न जानकी की खोज कराने की कोई व्यवस्था ही कि है।"

शरद का यह प्रसंग तुलसी रामायण में भी अत्यंत मनोरम और मार्मिक रूप से वर्णित है। यहाँ हैम 'किष्किंधा कांड' के इस शरद ऋतु वर्णन को अर्थ सहित उद्धृत कर रहे हैं - 

शरद ऋतु वर्णन
चौपाई : 
*** बरषा बिगत सरद रितु आई। लछमन देखहु परम सुहाई॥ फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥1॥ 
भावार्थ:- हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद ऋतु आ गई। फूले हुए कास से सारी पृथ्वी छा गई। मानो वर्षा ऋतु ने (कास रूपी सफेद बालों के रूप में) अपना बुढ़ापा प्रकट किया है॥1॥ 

*** उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहिं सोषइ संतोषा॥ सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा॥2॥ 
भावार्थ:- अगस्त्य के तारे ने उदय होकर मार्ग के जल को सोख लिया, जैसे संतोष लोभ को सोख लेता है। नदियों और तालाबों का निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोह से रहित संतों का हृदय!॥2॥ 

*** रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥ जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥3॥ 
भावार्थ:- नदी और तालाबों का जल धीरे-धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी (विवेकी) पुरुष ममता का त्याग करते हैं। शरद ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गए। जैसे समय पाकर सुंदर सुकृत आ सकते हैं। (पुण्य प्रकट हो जाते हैं)॥3॥ 

*** पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी॥ जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना॥4॥ 
भावार्थ:- न कीचड़ है न धूल? इससे धरती (निर्मल होकर) ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजा की करनी! जल के कम हो जाने से मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख (विवेक शून्य) कुटुम्बी (गृहस्थ) धन के बिना व्याकुल होता है॥4॥ 

*** बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा॥ कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक भाव भगति जिमि मोरी॥5॥ 
भावार्थ:-बिना बादलों का निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओं को छोड़कर सुशोभित होते हैं। कहीं-कहीं (विरले ही स्थानों में) शरद् ऋतु की थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है। जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं॥5॥ 

दोहा : 
*** चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि। जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि॥16॥ 
भावार्थ:-(शरद् ऋतु पाकर) राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी (क्रमशः विजय, तप, व्यापार और भिक्षा के लिए) हर्षित होकर नगर छोड़कर चले। जैसे श्री हरि की भक्ति पाकर चारों आश्रम वाले (नाना प्रकार के साधन रूपी) श्रमों को त्याग देते हैं॥16॥ 

चौपाई : 
*** सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकऊ बाधा॥ फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा॥1॥ 
भावार्थ:-जो मछलियाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्री हरि के शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलों के फूलने से तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है॥1॥ 

*** गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा॥ चक्रबाक मन दुख निसि पेखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी॥2॥ 
भावार्थ:-भौंरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं तथा पक्षियों के नाना प्रकार के सुंदर शब्द हो रहे हैं। रात्रि देखकर चकवे के मन में वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरे की संपत्ति देखकर दुष्ट को होता है॥2॥ 

*** चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकर द्रोही॥ सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई॥3॥ 
भावार्थ:-पपीहा रट लगाए है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्री शंकरजी का द्रोही सुख नहीं पाता (सुख के लिए झीखता रहता है) शरद् ऋतु के ताप को रात के समय चंद्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं॥3॥ 

*** देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई॥ मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा॥4॥ 
भावार्थ:-चकोरों के समुदाय चंद्रमा को देखकर इस प्रकार टकटकी लगाए हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान्‌ को पाकर उनके (निर्निमेष नेत्रों से) दर्शन करते हैं। मच्छर और डाँस जाड़े के डर से इस प्रकार नष्ट हो गए जैसे ब्राह्मण के साथ वैर करने से कुल का नाश हो जाता है॥4॥ 

दोहा : 
*** भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ। सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥17॥ 
भावार्थ:-(वर्षा ऋतु के कारण) पृथ्वी पर जो जीव भर गए थे, वे शरद् ऋतु को पाकर वैसे ही नष्ट हो गए जैसे सद्गुरु के मिल जाने पर संदेह और भ्रम के समूह नष्ट हो जाते हैं॥17॥

रविवार, 13 अगस्त 2017

वृद्धावस्था विमर्श और हिंदी कहानी (शुभाशंसा)

वृद्धावस्था विमर्श और हिंदी कहानी
शिवकुमार  राजौरिया
2017
अद्वैत प्रकाशन,  नई दिल्ली
ISBN : 978-93-82554-87-5
रु. 595, पृष्ठ 295

जब मैं था नवयुवक, वृद्ध शिक्षक थे मेरे,
भूतकाल की कथा गूढ़ बतलाते थे वे.
मैं पढ़ने को नहीं, वृद्ध होने जाता था,
आग बुझा कर शीतल मुझे बनाते थे वे.
पर, अब मैं बूढ़ा हूँ, शिक्षक नौजवान हैं,
उन्हें देख निज सोयी वह्नि जगाता हूँ मैं.
भूत नहीं, अब परिचय पाने को भविष्य का
यौवन के विद्या-मंदिर में जाता हूँ मैं.
                                  (राष्ट्रकवि डॉ. रामधारी सिंह ‘दिनकर’)

काल की गति क्षिप्र है. वह इतनी शीघ्रता से चला जाता है कि उस पर किसी की दृष्टि नहीं जाती. एक नवजात शिशु कब अपनी शैशवावस्था छोड़कर युवावस्था में पहुँचा और कब वृद्धावस्था में, यह पता ही नहीं चलता. वृद्धावस्था से कोई बच नहीं सकता. यह जीवन का सत्य है लेकिन मनुष्य वृद्धावस्था की कल्पना मात्र से ही डर जाता है, निराश हो जाता है और सब चीजों से कटा हुआ महसूस करता है. कहा जाए तो वह केंद्र से परिधि की ओर चला जाता है. उपेक्षित हो जाता है; समाज से, परिवार से और यहाँ तक कि अपने आप से. लेकिन वार्धक्य कोई अभिशाप नहीं, बल्कि वह जीवन की चरम स्थिति है. अर्थात जीवन के विकास की चरमावस्था है वृद्धावस्था. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का कथन है कि ‘इस अवस्था में लोगों के सभी भाव रस के रूप में परिणत होकर आनंदमय हो जाते हैं.’ युवावस्था में प्रायः आडंबरप्रियता और प्रदर्शनप्रियता को देखा जा सकता है लेकिन वृद्धावस्था में ये सब नहीं रह जाते. वृद्धावस्था का सच्चा आनंद आत्मसंतोष है. जिन्हें भविष्य की कोई चिंता नहीं रहती वे ही वृद्ध हैं. कहने का आशय है कि 75-80 वर्ष के होने पर भी जिस व्यक्ति को भविष्य की चिंता होती है वह युवा ही है, क्योंकि उसे कार्यों को पूर्ण करने की चिंता जीवन में कुछ और बेहतर करने के लिए प्रेरित करेगी. जैसे-जैसे मनुष्य अपने आपको वृद्ध मानने लगता है, वह कमजोर महसूस करने लगता है तथा सहानुभूति अर्जित करने की इच्छा रखता है. धीरे-धीरे वह परिधि की ओर जाने के लिए विवश हो जाता है. प्रायः यह देखा जाता है कि जब तक व्यक्ति परिवार के लिए कमाने का यंत्र है तब तक उसकी चलती है लेकिन जैसे ही उसका शरीर उसका साथ देना छोड़ देता है वैसे ही परिवार के सदस्यों के लिए वह एक ‘बेकार चीज’ बन जाता है. ऐसे में उसका अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाता है. ऐसी स्थिति में उनका कुंठित होना स्वाभाविक है. 

भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में वृद्धों की स्थिति दयनीय नहीं कही जा सकती. यहाँ बड़ों का मान-सम्मान किया जाता रहा है. कहा भी गया है, “अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः / चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्”. अर्थात प्रतिदिन बुजुर्गों को प्रणाम करने और उनकी सेवा करने वाले व्यक्ति की आयु, विद्या, कीर्ति और शक्ति की वृद्धि होती है. लेकिन आजकल यहाँ भी स्थितियाँ बदल रही हैं. मूल्य बदल रहे हैं. परिवार का विघटन हो रहा है. वार्धक्य समस्या बनने लगा है. जैसे जैसे मनुष्य बुढ़ापे की ओर चलता है वैसे-वैसे अकेलापन, संत्रास, भय और असुरक्षा आदि उसको घेर लेते हैं. दरअसल उसे सुरक्षा और स्नेह की आवश्यकता होती है. बदलती परिस्थितियों में, वृद्धों के मनोविज्ञान को समझना भर काफी नहीं है बल्कि आज के परिप्रेक्ष्य में उनके पुनर्वास का प्रश्न प्रबल हो उठा है. 

उत्तरआधुनिक समय में लोगों की दृष्टि हाशियाकृत समुदायों पर पड़ी है तो स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक के साथ-साथ अब वृद्धों पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है. परिणामस्वरूप वृद्धावस्था विमर्श उभरकर सामने आया है. लेकिन सिमोन द बुआ (9 जनवरी, 1908 – 14 अप्रैल, 1986) ने 1950 से ही वृद्धावस्था पर चिंतन-मनन करना शुरू कर दिया था. 1970 में प्रकाशित उनकी शोधपूर्ण कृति ‘ला विएलेस्से’ (फ्रेंच) इसका प्रमाण है. ‘ला विएलेस्से’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘ओल्ड एज’ (पैट्रिक ओ ब्रेन) 1977 में प्रकाशित हुआ. सिमोन की भविष्योन्मुखी विश्वदृष्टि के कारण यह कृति वृद्धावस्था विमर्श की गीता बन गई. हिंदी में चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने इस कृति का सार-संक्षेप ‘’वृद्धावस्था विमर्श’’ शीर्षक से प्रस्तुत किया है.

यों तो इसमें संदेह नहीं कि समाज, साहित्य और संस्कृति में वृद्ध सदा उपस्थित रहे हैं लेकिन उनकी यह उपस्थिति केंद्र की अपेक्षा परिधि पर अधिक रही है. केंद्र से अपदस्थ होते ही व्यक्ति समाज की उपेक्षा का पात्र हो जाता है. यहाँ तक कि बहुत बार तो उसे अपना जीवन अभिशाप सा प्रतीत होने लगता है. परिधि पर धकेले गए (हाशियाकृत) एक समुदाय के रूप में वृद्ध समुदाय दुनिया का बहुत बड़ा उपेक्षित जन समुदाय है. वृद्धावस्था विमर्श इस उपेक्षित समुदाय की दृष्टि से, अथवा वृद्धावस्था को केंद्र में रखते हुए, समाज, साहित्य और संस्कृति की नई व्याख्या करने वाला विमर्श है. जैसा कि पहले संकेत किया जा चुका है, वृद्धों और वृद्धावस्था पर हमारे यहाँ चिंतन की बड़ी पुरानी परंपरा है तो सही; लेकिन उस चिंतन परम्परा में वृद्धों को समाज में पुनर्वासित करने के स्थान पर वन की ओर प्रस्थान करने (वानप्रस्थ) और सब कुछ त्याग देने (संन्यास) के आदेश निहित हैं. आज का वृद्धावस्था विमर्श इससे आगे बढ़कर वृद्धों को समाज में पुनर्वासित देखना चाहता है. हिंदी में इस दिशा में ‘वागर्थ’ ने दिसंबर 1999 में प्रकाशित वृद्धावस्था विशेषांक के माध्यम से गंभीर विमर्श की शुरुआत की और यह संकेत दिया कि इक्कीसवीं शताब्दी के विश्व के समक्ष वृद्धावस्था संबंधी समस्याएँ बड़ी चुनौती प्रस्तुत करनेवाली हैं. इस वैचारिक पीठिका पर हिंदी कहानी साहित्य में वृद्धावस्था के चित्रण का अनुसंधान और विश्लेषण ही डॉ. शिवकुमार राजौरिया के प्रस्तुत ग्रंथ “वृद्धावस्था विमर्श और हिंदी कहानी” का लक्ष्य है. भूमंडलीकृत विश्व द्वारा अनुभव की जा रही वृद्धावस्था विषयक विकट समस्या से संबंधित होने के कारण यह शोधपूर्ण ग्रंथ साहित्य के साथ-साथ समाज के संदर्भ में भी अत्यंत प्रासंगिक है.

इस ग्रंथ की व्यापकता का अनुमान इस तथ्य से सहज ही किया जा सकता है कि डॉ. शिवकुमार राजौरिया ने इसकी विवेच्य सामग्री के रूप में हिंदी कहानी साहित्य से उन कहानियों को चुनकर ग्रहण किया गया है जिनमें वृद्धावस्था को मुख्य विषय अथवा कथ्य के रूप में स्वीकार किया गया है. उन्होंने बताया है कि इन कहानियों में - बेटोंवाली विधवा (प्रेमचंद), बूढ़ी काकी, (प्रेमचंद), अलग्योझा (प्रेमचंद), माँ (प्रेमचंद), मंत्र, (प्रेमचंद), स्वामिनी (प्रेमचंद), विध्वंस (प्रेमचंद), सुभागी (प्रेमचंद), गुदड़ी में लाल (जयशंकर प्रसाद), ममता (जयशंकर प्रसाद), बेड़ी (जयशंकर प्रसाद), चीफ की दावत (भीष्म साहनी), यादें (भीष्म साहनी), चचा मंगलसेन (भीष्म साहनी), खून का रिश्ता (भीष्म साहनी), पागल है (यशपाल), समय (यशपाल), दुःख का अधिकार (यशपाल), कौन जाने (यशपाल), समय (यशपाल), कैलाशी नानी (सुभद्रा कुमारी चौहान), वसीयत (भगवती चरण वर्मा), परमात्मा का कुत्ता (मोहन राकेश), आजादी (ममता कालिया), उधार की हवा (मृदुला गर्ग ), बांसफल (मृदुला गर्ग), छत पर दस्तक (मृदुला गर्ग), उर्फ सैम (मृदुला गर्ग), मजबूरी (मन्नू भंडारी), मास्टर साहब (चंद्रगुप्त विद्यालंकार), पादुका पूजन (प्रतिभा राय), सीढ़ी (सूर्यबाला), सौगात (सूर्यबाला), दादी और रिमोट (सूर्यबाला), दादी का खजाना (सूर्यबाला), दादी माँ (शिवप्रसाद सिंह), दादी (शिवानी), माँ (ए.असफल), शापमुक्ति (रमेश उपाध्याय), जींस (मनोज कुमार पाण्डेय), ताई (विश्वंभरनाथ कौशिक), हरिहर काका (मिथिलेश्वर), वापसी (उषा प्रियंवदा), उतनी दूर (राज़ी सेठ), उसका आकाश (राज़ी सेठ), साधें (गोविन्द मिश्र), गेंद (चित्रा मुदगल), फाइल दाखिल दफ्तर (गिरिराज किशोर), अपना घर (रामधारी सिंह दिवाकर), बुढऊ का आधुनिकीकरण (गिरीश अस्थाना), हाँच (सुनील सिंह), उसका जाना (दिनेश चंद्र झा), फाग पिया संग (चन्द्रिका ठाकुर देशदीप), समय (सिद्धेश), यक्ष प्रश्न (दयानन्द पांडेय), बांधों न नाव इस ठांव बंधु (उर्मिला शिरीष), साँझ का परिंदा (आदर्श मदान), आँख मिचौनी (अमृतराय), बूढ़ा ज्वालामुखी (गिरिराज शरण अग्रवाल), घेरे (गोविन्द मिश्र), पिता (ज्ञानरंजन), सीमेण्ट में उगी घास (दयानन्द अनन्त), शटल (नरेन्द्र कोहली), तिनकों का घोंसला (प्रतिमा वर्मा), ग्राम माता (बाबू सिंह चौहान), दादी का बटुआ (मंजुल भगत), मोहताज (रामकुमार भ्रमर), अनाधिकृत स्वप्न (सत्यराज), पराजित (सुनील कौशिक), घुन (सुरेश उनियाल), मौत के लिए एक अपील (साजिद रशीद), मुट्ठी भर धूल (मुरारी शर्मा), कितने दीनू कितने दीनानाथ (राजेश झरपुरे), अम्मा (डॉ.श्रीमती कमल कुमार), नानी (संजीव दत्त शर्मा), बस कब चलेगी(संजय विद्रोही), बोनसाई (योगिता यादव), अपूर्णा (अलका सिन्हा), बाबूजी (डॉ.शिबन कृष्ण रैणा), माचिस की डिबिया (चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद) और खिड़की (राजेन्द्र कृष्ण) तथा माई (हरि भटनागर) - सम्मिलित हैं. 

विद्वान लेखक ने सबसे पहले तो वृद्धावस्था विमर्श की सैद्धांतिक पीठिका तैयार की है और वृद्धों की मानसिकता पर इस संदर्भ में विचार किया है कि वृद्धावस्था में व्यक्ति के मनोजगत में विभिन्न दैहिक , सामाजिक, आर्थिक और नैतिक कारणों से परिवर्तन घटित होते हैं. यहाँ वृद्धावस्था में परनिर्भरता से उत्पन्न कुंठाओं, और मूल्य परिवर्तन का विवेचन करते हुए वर्तमान विश्व के समक्ष उपस्थित वृद्धों के पुनर्वास की समस्या का भी विश्लेषण किया गया है. इसके बाद उन्होंने आधुनिकीकरण, भूमंडलीकरण और सामाजिक परिवर्तन के साथ भारतीय समाज में वृद्धों की बदलती हुई स्थिति तथा वृद्धों की सामाजिक समस्याओं का विवेचन किया है. इतनी विस्तृत पृष्ठभूमि निर्मित करने के बाद लेखक ने हिंदी कहानियों का वृद्धावस्था विमर्श के कोण से नया पाठ, जिसे वृद्ध-पाठ कहा जा सकता है, तैयार किया है. इसके लिए उन्होंने चयित कहानियों में अभिव्यक्त वृद्धों की मानसिकता का पहले तो वृद्धावस्था जनित असुरक्षा एवं उससे जुड़े मनोभावों -आशंका और अनिश्चितता - के चित्रण के संदर्भ में सोदाहरण विश्लेषण किया है. फिर एकाकीपन, स्मृति और मृत्युबोध के संदर्भ में वृद्धावस्था के चित्रण की प्रामाणिकता की सूक्ष्म और गहन पड़ताल की है.

डॉ. राजौरिया के इस ग्रंथ का एक और सर्वथा मौलिक योगदान वृद्धों की भाषा का सामाजिक संदर्भ को खोज निकालने से सम्बंधित है. उन्होंने वृद्धों की भाषा के संदर्भ में चयित कहानियों का पाठ विश्लेषण यह मान कर किया है कि समाजभाषिक दृष्टि से व्यक्ति का भाषा व्यवहार की उसकी सामाजिक स्थिति पर निर्भर रहता है. लेखक ने जहाँ एक ओर यह प्रतिपादित किया है कि वृद्धजन का भाषिक आचरण उनके अनुभव और आयु से जुड़े बड़प्पन को प्रकट करता है, वहीं यह भी सिद्ध किया है कि कहानीकारों ने वृद्ध पात्रों के संवादों के गठन में घर-परिवार और समाज में उनके स्थान, पद और रुतबे के साथ-साथ उनकी हाशियाकृत एवं उपेक्षापूर्ण स्थिति का ध्यान रखते हुए ऐसी भाषा का प्रयोग किया है जो वृद्धों की सामाजिक-मानसिक दशा का प्रतिबिंब है. वार्ता आरंभ, वार्ता परिवर्तन, प्रश्न, आदेश और विनम्रता से जुड़े वृद्धों के संवादों का सामाजिक स्थिति के संदर्भ में ऐसा विश्लेषण अन्यत्र दुर्लभ है. मेरी समझ में इसका कारण यह है कि डॉ. शिवकुमार राजौरिया ने यह समस्त कार्य डॉ. ऋषभ देव शर्मा जी की देखरेख में उनसे वृद्धावस्था विमर्श और समाजभाषाविज्ञान की दीक्षा लेकर संपन्न किया है.

यहाँ एक और बात की चर्चा मुझे ज़रूरी लग रही है. वह यह कि इस ग्रंथ की तैयारी के लिए कहानी साहित्य का अध्ययन-मनन करते- करते शिवकुमार राजौरिया स्वयं कीटभृंगी न्याय से कहानीकार बन गए. दरअसल डॉ. ऋषभदेव शर्मा प्रायः उन्हें प्रेरित करते रहते थे - इतनी कहानियाँ पढ रहे हो, कुछ अपना भी लिखो ना! - और एक दिन कुलबुलाते बीज में अंकुर निकल आया. एक परिचित वृद्ध को केंद्र में रखकर उन्होंने एक कहानी लिख दी - ‘बूढी हड्डियाँ’. तनिक नोक पलक संवारकर कहानी छपने के लिए भिजवा दी गई. हफ्ते भर में ‘स्वतंत्र वार्ता’ में छप भी गई. बस फिर क्या था लेखक की धड़क खुल गई और इस ग्रंथ के साथ-साथ उनका कहानी लेखन भी चल निकला कोई तीस कहानियाँ तो हो ही गई होंगी!- अधिकतर वृद्धावस्था विमर्श पर केंद्रित! स्रवंति, दक्षिण समाचार, हिंदी मिलाप, स्वतंत्र वार्ता और श्रीमिलिंद में लगातार छपती भी रहीं. संग्रह भी आ गया –‘ऑटोग्राफ एवं अन्य कहानियाँ’ (2012 : चेतक बुक्स, 1075, फ्लैट संख्या 3, बी विंग, येवले म्हस्के अपार्टमेंट ,सदाशिव पेठ, पूना-30) जिसे सुधी पाठकों और विद्वानों का भरपूर स्नेह मिला. 

मुझे पूर्ण विश्वास है कि डॉ. शिवकुमार राजौरिया के इस ग्रंथ को भी हिंदी जगत में स्नेह और सम्मान मिलेगा. मैं उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामना व्यक्त करती हूँ. साथ ही, इस अत्यंत मौलिक, प्रासंगिक, महत्वपूर्ण, पठनीय एवं संग्रहणीय ग्रंथ को पाठकों तक पहुँचाने के लिए प्रकाशक को भी बधाई देना चाहती हूँ. 

अनंत शुभेच्छाओं सहित,

30 अप्रैल, 2017                                                                                                         – गुर्रमकोंडा नीरजा 
                                                                                                                                              प्राध्यापक 
                                                                                                                  उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
                                                                                                                 दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा 
                                                                                                               खैरताबाद, हैदराबाद – 500004.
                                                                                                                 neerajagkonda@gmail.com

समकालीन सरोकार और साहित्य (भूमिका)

समकालीन सरोकार और साहित्य 
संपादक : ऋषभ देव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा
अतुल्य पब्लिकेशंस, सी -5 /एफ - 2, ईस्ट ज्योति नगर, दिल्ली - 110 093
प्रथम संस्करण : 2017
मूल्य : रु 500
ISBN  : 978-93-82553-66-3  

दक्षिण भारत में किए जा रहे हिंदी भाषा और साहित्य विषयक शोध लेखन की एक छवि प्रस्तुत करने के लिए पिछले दो वर्षों में हमने दो पुस्तकें ‘संकल्पना’ (2015) तथा ‘अन्वेषी’ (2016) हिंदी पाठकों को समर्पित की हैं। ‘समकालीन सरोकार और साहित्य’ इस शृंखला की तीसरी कड़ी है। विशेष रूप से शोधार्थियों की माँग पर इसमें शोध विमर्श संबंधी व्यावहारिक जानकारियाँ शामिल की गई हैं। साथ ही इसका क्षेत्र अब दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है। 

हिंदी साहित्य और भाषा विषयक अनुसंधान के क्षेत्र में शोध पत्र और शोधप्रबंध के लेखन में मानकता की दृष्टि से प्रायः बड़ी अराजकता देखने को मिलती है। इसका एक बड़ा कारण शोध लेखन के संबंध में स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय प्रारूपों के प्रति उपेक्षा भाव है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए शोध संबंधी मानक लेखन के लिए व्यापक रूप से स्वीकृत दो प्रारूपों की हिंदी के संदर्भ में प्रस्तुति इस पुस्तक को विशिष्ट बनाती है। ए.पी.ए. और एम.एल.ए. प्रणालियों की यह जानकारी हिंदी में पहली बार इस रूप में प्रस्तुत की जा रही है जो शोधार्थियों और शोध निर्देशकों के लिए समान रूप से उपयोगी है। इसके अलावा हिंदी में शोध की संभावनाओं एवं सकारात्मक मनोविज्ञान जैसी नई दिशाओं का उद्घाटन करने वाली सामग्री भी अत्यंत उपयोगी है। 

यह पुस्तक समसामयिक अद्यतन हिंदी शोध में लोकप्रियता प्राप्त कर रहे दलित एवं स्त्री आदि हाशिया विमर्शों के आलोक में कविता, उपन्यास और कहानी जैसी विधाओं का पुनर्पाठ तो प्रस्तुत करती ही है, साथ ही भाषा विमर्श और मीडिया विमर्श के नए आयामों को भी प्रस्तुत करती है। 

विश्वास है कि भाषा और साहित्य संबंधी अनुसंधानकर्ताओं और सुधी पाठकों को हमारा यह प्रयास पसंद आएगा। 

पुस्तक के सुरुचिपूर्ण मुद्रण एवं प्रकाशन के लिए हम अतुल्य पब्लिकेशन्स के श्री अतुल माहेश्वरी और श्री आदित्य माहेश्वरी के प्रति विशेष रूप से आभारी हैं। इस पूरी योजना में सहयोग के लिए श्री वी. कृष्णाराव का हार्दिक धन्यवाद।

1 मई, 2017                                                                                                                       - ऋषभ देव शर्मा 

                                                                                                                                        गुर्रमकोंडा नीरजा 

शनिवार, 3 जून 2017

आत्मकथा के बहाने छत्तीसगढ़ की अंचल कथा

मुझे कुछ कहना है – III (2017)/ डॉ. रामनिवास साहू/ गाजियाबाद : उद्योगनगर प्रकाशन/ पृष्ठ 136/ मूल्य : रु. 200/-
हिंदी गद्य साहित्य में आत्मकथा लेखन की परंपरा अत्यंत समृद्ध है. महापुरुषों, साधु-महात्माओं, समाज सुधारकों, राजनेताओं और साहित्यकारों ने अपने बाहरी और भीतरी जीवन संघर्ष को आत्मकथाओं के माध्यम से इस तरह व्यक्त किया है कि पाठक को उनसे प्रेरणा प्राप्त होती है. आत्मकथाओं के अगले वर्ग में वे रचनाएँ आती हैं जिनमें निज के बहाने लेखकों ने अपने समुदाय के कष्टों और सच्चाइयों का उत्तम पुरुष शैली में वर्णन किया है और दलित विमर्श तथा स्त्री विमर्श को धार देने में कामयाबी हासिल की है. इसी की अगली कड़ी के रूप में आंचलिक विमर्श को एक नया आयाम डॉ. रामनिवास साहू ‘मुझे कुछ कहना है’ शीर्षक अपनी बहुखंडीय आत्मकथा के माध्यम से देने का प्रयास कर रहे हैं. 

यहाँ ठहर कर यह जान लेना जरूरी है कि – ये डॉ. रामनिवास साहू हैं कौन? उनका जन्म वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के कोरबा जिला के वनवासी अंचल कोरबी में 21 फरवरी, 1954 को हुआ. उनके पूर्वज दो पीढ़ी पहले ही इस वनांचल में आकर बसे थे. कोरबी में जन्मे इस बालक ने किन विपरीत परिस्थितियों में किस-किस तरह के पापड़ बेलते हुए कैसे-कैसे उच्च शिक्षा प्राप्त करने की अपनी जिद पूरी करके दिखाई और कैसे भाषाविज्ञान में एमए करके छत्तीसगढ़ की मुंडा भाषाओं के सर्वेक्षण जैसे विषय पर पीएचडी हासिल की, यह भी इस आत्मकथा का हिस्सा है. साथ ही एक छोटे ग्रामीण दुकानदार का बेटा कैसे अंधविश्वास, कलह और भितरघात से ग्रसित परिवेश से निकलकर केंद्रीय हिंदी संस्थान के क्षेत्रीय निदेशक पद तक पहुँचा, इसकी गाथा भी निरंतर परिश्रम और मूल्यनिष्ठा के प्रति आस्था जगाने वाली गाथा है. 

यों तो डॉ. रामनिवास साहू अपने विद्यार्थी काल से ही कुछ न कुछ लिखते रहे हैं. वनवासी और बिगुल शीर्षक से उनकी दो पुस्तकें क्रमशः 2002 और 2003 में आ चुकी हैं तथा भाषाविज्ञान और पत्रकारिता पर भी उनकी चार किताबें आई हैं; लेकिन ‘मुझे कुछ कहना है’ उनके लेखन की नई पारी का प्रतीक है. इसके दो खंड (पहला और तीसरा) 2017 की प्रथम छमाही में प्रकाशित हुए हैं. लेखक की घोषणा के अनुसार आगे और तीन खंड आने हैं. 

इस औपन्यासिक आत्मकथा के तीसरे खंड की भूमिका में लेखक ने बताया है कि “मेरा जीवनवृत्त बहुत ही सुंदर, सुदृढ़ तथा स्वर्णमय है. यह उस गाँव के लिए अत्यंत गौरवमय है जिससे प्रेरित होकर हर कोई देश को, राष्ट्र को समझना चाहेगा तथा राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा में आने के लिए स्वतः प्रेरित होकर सोपान-दर-सोपान कदम बढ़ाना चाहेगा.” इसका अर्थ यह है कि लेखक अपनी आत्मकथा को छत्तीसगढ़ के उस अंचल की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्पद मानता है जिसकी जमीन से वह स्वयं उगा है. इस खंड में उनके सोलहवें वर्ष की कथाएँ हैं.

किसी व्यक्ति के जीवन में सोलहवाँ वर्ष बड़ा महत्वपूर्ण होता है. किशोरावस्था के सपने इसी उम्र में आँखों में अंगडाई लेते हैं और यही उम्र यह तय करती है कि वह व्यक्ति किस दिशा में जाएगा. यहाँ कथानायक भविष्य के सपने बुन रहा है. इन सपनों में अब फ़िल्मी नायक-नायिका आने लगे हैं. हर महीने फिल्म देखने का नियम जैसा बन गया है. इस फिल्म-प्रेम ने कथानायक के मन में सामाजिक सवाल खड़े किए और बोध का निर्माण करने में बड़ी भूमिका निभाई. गाँव की प्रभातफेरी और रामचरितमानस के पाठ जैसी चीजों ने उसके इस बोध को राष्ट्रीयता के साथ जोड़ा. कॉलेज जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों ने भी कई तरह के मानसिक द्वंद्व खड़े किए, लेकिन भटकने की सारी सुविधाओं के बावजूद कथानायक की दृष्टि से शिक्षा रूपी मछली की आँख कभी ओझल नहीं हो सकी. आचार-विचार की सहजता का संस्कार उसे अपने माता-पिता और पालनहारी पिसौदहीन बड़कादाई से मिला था जिसे श्रीराम शर्मा आचार्य के जीवन दर्शन ने और भी ऊँचाई प्रदान की. यही वह संबल था जिसने कथानायक को कीचड़ में कमलवत रहने की दीक्षा दी. 

इसमें संदेह नहीं कि ‘मुझे कुछ कहना है’ के इस तीसरे खंड में छत्तीसगढ़ के आंचलिक वनवासी जीवन के अँधेरे-उजाले का संघर्ष लेखक के अपने जीवनसंघर्ष के ‘बैकड्रॉप’ के रूप में चित्रित है. ये दोनों संघर्ष एक-दूसरे को उभारकर दिखाते हैं और पाठक आत्मकथा के बहाने अंचलकथा का भी आनंद प्राप्त करता चलता है. 

पुस्तक के प्रकाशन पर लेखक और प्रकाशक को हार्दिक बधाई.  

गुरुवार, 1 जून 2017

हिंदी साहित्य को सैयद गुलाम नबी ‘रसलीन’ का प्रदेय

[1]

भारतीय संस्कृति की आत्मा इस देश की विविध भाषाओं के माध्यम से अभिव्यक्ति प्राप्त करती है। भारत की सभी भाषाएँ और उनकी साहित्यिक विरासत सबकी साझी संपदा है और उसे सभी देशवासियों ने समृद्ध किया है, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान या किसी अन्य धर्म-संप्रदाय के अनुयायी। इनमें भी हिंदी अपने केंद्र से बाहर फैलने वाले चरित्र और सर्वसमावेशी स्वरूप के कारण सब को जोड़ने वाली भाषा रही है। इसके साहित्य की समृद्धि में आरंभ से ही मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान इसे सबकी साझा विरासत प्रमाणित करता है। दरअसल हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में उर्दू, सिंधी, मराठी, गुजराती, तेलुगु आदि भाषाओं के साहित्यकारों का उल्लेखनीय योगदान है। 

हिंदी साहित्य की भूमिका का निर्माण करने में अपभ्रंश साहित्य ने नींव का काम किया। उस अर्थात अपभ्रंश काल में ‘संदेश रासक’ के रचनाकार अद्दाहमाण या अब्दुल रहमान को कौन नहीं जानता। आगे चलकर खुद की ‘हिंदी की तूती’ घोषित करने वाले अमीर खुसरो को तो खड़ी बोली के पहले कवि होने का गौरव हासिल हुआ। उनके बाद मलिक मुहम्मद जायसी, उसमान, कासिमशाह, नूर मुहम्मद, आलम, जमाल, रहीम, सैयद मुबारक अली बिलग्रामी, सैयद गुलाम नबी ‘रसलीन’ आदि अनेक मुस्लिम साहित्यकारों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। इनकी रचनाओं में सामासिक संस्कृति, समन्वय की भावना तथा गंगा-जमुनी तहजीब को रेखांकित किया जा सकता है। 

जब कभी मध्यकाल में हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले मुस्लिम साहित्यकारों की बात होती है तो चर्चा प्रायः जायसी से शुरू होकर रहीम तक आकर सिमट जाती है। ‘रसलीन’ का नाम भर ले लिया जाता है। जबकि वे इससे अधिक के अधिकारी हैं। मैं महज उन्हीं के प्रदेय पर संक्षेप में चर्चा कर रही हूँ। 

[2]
अमिय, हलाहल, मद भरे, सेत स्याम रतनार। 
जियत, मरत, झुकि झुकि परत, जेहि चितवत इक बार॥

कई बार बिहारी का समझ लिया जाने वाला यह दोहा ‘रसलीन’ का है। 

‘अंग दर्पण’ (1737 ई.) और ‘रस प्रबोध’ (1749 ई.) के रचनाकार, ‘रसलीन’ (1689-1750) उपनाम से विख्यात रीतिग्रंथकार का पूरा नाम है सैयद गुलाम नबी ‘रसलीन’। ये जिला हरदोई के बिलग्राम के रहने वाले थे। इनके पिता सैयद मुहम्मद बाकर थे। रसलीन ने स्वयं अपनी वंश परंपरा के बारे में कहा है कि उनके पूर्वज हिंदुस्तान में आकर बस गए थे।[1] रसलीन ने हिंदुस्तान के लिए ‘हिंदुवान’ शब्द का प्रयोग किया है। इस शब्द का प्रयोग चंद्रबरदाई कृत ‘पृथ्वीराज रासो’ के ‘पद्मावती समय’ में भी प्राप्त होता है। 

रसलीन के जन्म के बारे में एक दोहे में संकेत किया गया कि ‘मैं (रसलीन) सूरी के फूल (सूरजमुखी) के समान खिला हूँ और अपनी जन्म तिथि जो मैंने स्वयं कही ‘नूर चश्मे बाकरे अब्दुल हमीदम’ (1111 हिजरी) है।‘[2] इसके अनुसार गणना करके रामनरेश त्रिपाठी ने रसलीन के जन्म का वर्ष सन 1689 ई. माना है।[3]

‘हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास (भाग 6)’ से पता चलता है कि रसलीन केवल कवि नहीं थे अपितु वे सुयोग्य सैनिक, तीरंदाज और घुड़सवारी में निपुण व्यक्ति थे। नवाब सफदरजंग की सेवा में थे और उनकी सेना के साथ पठानों से युद्ध करते हुए आगरा के समीप सन 1750 ई. में शहीद हुए। ‘रसलीन ग्रंथावली’ में इस बात का उल्लेख है कि “जीवन यापन के क्षेत्र में अपने कर्म के कारण वे प्रतिष्ठित थे। स्वाभिमान उनका ऐसा था कि किसी के भी सामने वे झुकने वाले नहीं थे। इसीलिए गुरु, ईश्वर, धर्म दूतों, पूर्वजों, संतों आदि की स्तुति एवं प्रशंसा तो उन्होंने की है पर किसी राजा-महाराजा, नवाब या स्वामी की प्रशंसा से अपनी लेखनी का मुख मलीन नहीं किया।“[4]

रसलीन की प्रसिद्ध पुस्तक ‘अंग दर्पण’ में कुल 180 दोहे सम्मिलित हैं। ‘हिंदी साहित्य कोश’ के अनुसार “यद्यपि रसलीन ने इसे ‘ब्रजबानी सीखन रची’ (अर्थात ब्रजभाषा सीखने के लिए रचित) घोषित किया है, पर भाषा और शैली की दृष्टि से यह प्रौढ़ तथा सुकुमार रचना है।“[5] इसमें नायिका के अंगों, आभूषणों, भंगिमाओं, चेष्टाओं आदि का उपमा तथा उत्प्रेक्षा युक्त चमत्कारपूर्ण वर्णन निहित है। 

रसलीन ने 'रस प्रबोध' नामक रस निरूपण ग्रंथ का भी सृजन किया। इसमें कुल 1127 दोहे सम्मिलित हैं जिनमें रस, भाव, नायिकाभेद, षट्ऋतु वर्णन, बारहमासा आदि अनेकानेक प्रसंग निहित हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की मान्यता है कि “रसविषय का अपने ढंग का यह छोटा और अच्छा ग्रंथ है।‘[6] रसलीन ने भी स्वयं इस बात पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस छोटी सी पुस्तक को पढ़ने लेने पर रस विषयक जानकारी हेतु किसी अन्य पुस्तक को पढ़ने की आवश्यकता नहीं रहेगी। इस पुस्तक में मुख्य रूप से शृंगार रस और नायिका भेद का विस्तार है। अन्य रसों के संक्षिप्त वर्णन सम्मिलित है। “इनका सिद्ध छंद दोहा है, समस्त ग्रंथ छंद में है, लक्षण हों या उदाहरण।“[7]

रसलीन की दोनों रचनाओं का अध्ययन करने पर यह पता चलता है कि उन्हें भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा और रूढ़ियों की गहरी जानकारी थी। उसकी बारीकियों को आत्मसात करके उन्होंने इन रीतिग्रंथों की रचना की। विभिन्न लक्षणों का उल्लेख करने के बाद उन्होंने जो उदाहरण दिए हैं उनमें भारतीय संस्कृति, इतिहास, लोक और पुराण के संदर्भ निहित हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि वे संस्कृत के बड़े विद्वान थे। 

[3]

गंगा जमुनी तहज़ीब 

यह ठीक है कि रसलीन सैयद मुस्लिम थे लेकिन वे संस्कृत भाषा और साहित्य के पंडित थे और उन्होंने जिस प्रकार हिंदी साहित्य को समृद्ध किया उससे यही कहा जा सकता है कि हिंदी किसी धर्म विशेष की भाषा नहीं है बल्कि हिंदुओं और मुसलमानों की साझी विरासत है जिसमें इनकी गंगा-जमुनी तहज़ीब समाई हुई है।

रसलीन ने अपने दोहों में गुरु, ईश्वर, पैगंबर, नबी, पूर्वजों और संतों की स्तुति तो की है लेकिन किसी राजा-महाराजा या नवाब की प्रशंसा नहीं की। बिलग्राम में हिंदू-मुसलमान सभी अपने-अपने धर्म की उपासना करते थे, बिना किसी दबाव के। वे अपने धर्म के साथ-साथ दूसरों के धर्म का सम्मान करते थे। रसलीन सहिष्णु थे। उनके दोहों में मुहम्मद साहब, हजरत अली, इमाम हसन, इमाम हुसैन, मुईनुद्दीन चिश्ती, पीर आदि के साथ-साथ राम, हनुमान, लक्ष्मण, राधा, कृष्ण, पार्वती, सरस्वती, इंद्र आदि के संदर्भ गुंथे हुए हैं। वे कृष्ण की वंशी का वर्णन[8] करते हुए कहते हैं कि वंशी गोपियों को उनके वंश से इस तरह अलग करके उनके प्राण ले लेती है जैसे मछली पकड़ने वाला काँटा मछली को जल से अलग करके उसके प्राण हर लेता है। यह बाँसुरी कृष्ण के अधरों की सुधा का पान करती है लेकिन अपनी ध्वनि के रूप में ऐसा विष उगलती है जो गोपियों को बिलखने के लिए विवश करता है। वंशी माधुरी का प्रभाव इतना सम्मोहक है कि उसके रस में देह और अदेह सभी लीन हो जाते हैं और पशु-पक्षी तक इस प्रकार स्तंभित हो जाते हैं कि मानो किसी ने उन्हें मार ही डाले हो। रसलीन की गोपिका तो यहाँ तक कहती है कि ब्रह्मा ने इस भय से ही शेष नाग को कान नहीं दिए हैं कि कहीं कृष्ण की वंशी की ध्वनि सुनकर वह धरती को अपने सिर से फेंक कर इस ध्वनि पर झूमने न लगे। यह वर्णन इस बात की गवाही देता है कि सैयद गुलाम नबी ‘रसलीन’ श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के उस प्रसंग से भलीभाँति परिचित थे जिसमें मुनि शुकदेव ने राजा परीक्षित को कृष्ण की वंशी के सम्मोहक प्रभाव के बारे में बताया है। अभिप्राय यह है कि रसलीन ने विषय वस्तु और प्रतीकों का चयन भारतीय महाकाव्यों की परंपरा से किया है, फ़ारसी साहित्य से नहीं। इसीलिए उनका साहित्य सही अर्थों में भारतीय संस्कृति का वाहक प्रतीत होता है। 

इसी प्रकार एक और दोहे में रसलीन ने कहा कि भादों के दिन जादव के बिना अर्थात यादवकुल के श्रीकृष्ण के बिना बिताना कठिन है।[9] भयानक रस का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि रावण के दस मुँह और बीस बाँह हैं, यह सुनकर राम की वानर सेना भयभीत हो गई। अचानक रावण का रूप देखकर वानर सेना धूप की भाँति पीली पड़ गई।[10] इस प्रकार के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं जिनमें कवि ने राम और कृष्ण की कथा से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख किया है। यह तभी संभव है जब कवि ने इन कथाओं को आत्मसात कर रखा हो। 

रसलीन उदारमना सहिष्णु कवि थे। वे इस्लाम धर्म के अनुयायी थे परंतु किसी भी प्रकार का कट्टरवाद उन्हें छू भी नहीं गया था। रीतिकाल के इस कवि में किसी संत कवि जैसी उदारता दिखाई देती है। वस्तुतः “संत और कवि होने के लिए आदमी होना पहले आवश्यक है, फिर कुछ और। अपने धर्म का सच्चा अनुयायी दूसरे धर्म को गिराता नहीं क्योंकि किसी को उठा कर जो श्रद्धार्जन नहीं कर सकता, वह किसी को गिरा कर स्वयं ऊँचा नहीं उठ सकता।“[11] रसलीन सही अर्थ में मनुष्य थे और अपने धर्म के श्रद्धावान अनुयायी। इसलिए अन्य धर्मों के प्रति वे परम सहिष्णु थे। इस सहिष्णुता को उनके व्यक्तित्व एवं साहित्य में भलीभाँति देखा जा सकता है। 

रसलीन अपने गुरु तुफ़ैल मुहम्मद बिलग्रामी की प्रशस्ति करते हुए उन्हें देवगुरु वृहस्पति का अवतार बताते हैं - “देस बिदेसन के सब पंडित/ सेवत हैं पग सिष्य कहाई।/ आयो है ज्ञान सिखावन को/ सुर को गुरु मानुस रूप बनाई।“[12] इससे न केवल रसलीन के गुरु की महिमा प्रतिष्ठित होती है, अपितु उन्हें बृहस्पति के समान मान कर अपने जिस संस्कार का बोध कवि ने कराया है वह सर्वथा भारतीय है। इस संस्कार ने ही वस्तुतः गंगा-जमुनी तहज़ीब का निर्माण किया है। 

रसलीन संस्कृत काव्यशास्त्र की परंपरा में निष्णात है। उन्होंने आवश्यकतानुसार भरत के नाट्यशास्त्र, केशव की कविप्रिया तथा संस्कृत-हिंदी ग्रंथों के मतों का उल्लेख मात्र ही नहीं किया, अपितु उन पर अपने चिंतनशील विचार भी व्यक्त किए। उनके काव्य की परिधि विस्तृत है। वह केवल शृंगार वर्णन तक सीमित नहीं। बड़ी बात यह है कि उनके काव्य में भारतीयता का समावेश है। इसमें उन्होंने तत्कालीन लोकजीवन की अनुभूतियों को मूर्तित किया है, लोक जीवन में प्रचलित कथाओं, मान्यताओं, अनुभूतियों आदि को उकेरा है। उस युग के व्यक्ति का जीवन इतना जटिल नहीं था जितना आज है। उस समय पीर और शहीद के प्रति आस्था थी तो लोग मंदिर और पाठशाला भी बनवा देते थे। यही कारण है कि रसलीन जहाँ नबी की स्तुति[13] करते हैं वहीं भगीरथी गंगा की भी स्तुति एक हिंदू भक्त की भाँति भारतीय पद्धति के अनुसार करते हुए स्मरण करते हैं कि गंगा विष्णु के पैरों से निकलकर शिव के सीस में जा बसी।[14] इसे पढ़ते समय रहीम का दोहा याद आता है कि “अच्युत चरन तरंगिनी, शिव सिर मालति माल।/ हरि न बनायो सुरसरी, कीजो इंदव भाल।“ 

भारतीय परंपरा में किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले विघ्नविधाता गणपति की स्तुति की जाती है। रसलीन भी ‘रस प्रबोध’ में सोहिल विवाह के प्रसंग में गणपति की आराधना करते हैं – “गनपति आराधि आदि, उत्तम सगुन साधि/ सुभ घरी, धरी लगन।/ गावत गुनीन गायन, मोहत नर नारायन/ इंद्रादिक सुन सुन होत मगन॥“[15] यहाँ गणपति की आराधना, उत्तम शकुन साधना, शुभ घड़ी और शुभ लग्न विचारना और नर-नारायण तथा इंद्रादिक देवों का उल्लेख कवि के भारतीय परंपरा में पगे होने का प्रमाण है। 

‘रसप्रबोध’ की शुरूआत में भी रसलीन मंगलाचरण[16] करते हैं कि अल्लाह - अलह अर्थात अगोचर है, अनादि है, अनंत है नित्य पवित्र सृष्टि करने वाला है, सृष्टिकर्ता है। वह असीम है। वह सर्वत्र व्याप्त है। 

अच्छे कलाकार की पहचान यह है कि वह कभी भी अपनी रचना से पूर्ण संतुष्ट नहीं होता। संतोष का अर्थ जड़ता है जो रचनाकार का अभिमत नहीं। इसीलिए शायद रसलीन अपने भावों को व्यक्त करने के लिए छंदों का आधार लेकर भावचित्रों को उकेरते हैं। उनके पास शब्द भंडार की अक्षय निधि है। वे तत्कालीन भाषाओं – अरबी, फारसी, संस्कृत, रेख्ता के पंडित थे।[17] अतः वे शब्द चयन का ऐसा परिचय देते हैं कि उनके द्वारा चयनित शब्द सहज प्रतीत होते हैं। अन्य रीतिकालीन कवियों की भाँति रसलीन ने भी प्रकृति वर्णन किया है लेकिन इनका प्रकृति चित्रण केवल नदी, पहाड़, जंगल, ग्रह, नक्षत्र आदि तक सीमित न होकर उनके प्रभाव से उत्पन्न परिणाम का भी परिचायक है।[18] साथ ही, उनकी सौंदर्यबोध भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपरा के आधार पर विकसित प्रतीत होता है। 

रसलीन के प्रकृति चित्रण में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देगा कि कवि ने कहीं कहीं प्रकृति का मानवीकरण किया है तो कहीं प्रकृति को स्वतंत्र रूप में ग्रहण किया है। प्रकृति चित्रण द्वारा सहृदय पाठक को प्रभावित करने के लिए वे प्रकृति के जिन तत्वों को उपमान के रूप में प्रयोग करके भाव तथा रूप विधान को प्रस्तुत करते हैं[19], वह भी भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपरा और संस्कृत से चली आ रही सौंदर्य चेतना के अनुरूप है। यह तथ्य भी रसलीन को भारतीय तहज़ीब के उन्नायक के रूप में प्रतिष्ठित करता है। इस तरह के चित्रण के लिए उन्होंने लोक जीवन के अनुभव का सहारा लिया है। सहज आस्था और विश्वास लोक से ही प्राप्त किया जा सकता है। रसलीन के काव्य में लोक पग-पग पर मुखरित है। उदाहरण स्वरूप छ्ट्ठी,[20] पालना,[21] समधिन[22] आदि विषयों पर लिखे गए दोहों की चर्चा की जा सकती है। 

रसलीन ने अपने दोहों के माध्यम से गोपालन की भारतीय संस्कृति को भी दर्शाया है। वे कहते हैं कि आँख या दृष्टि रूपी मथनी से मेरे हृदय रूपी मटकी को मथ करके ग्वालिनी मेरे मन का मक्खन ले गई। और अब शरीर छाछ की तरह हो गया है।[23] गौ-संस्कृति से अनुप्राणित व्यक्ति ही गोकुल-गोपी-गोपाल की लीला का इतना समर्थ सांगरूपक रच सकता है। 

अद्वैत का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए रसलीन कहते हैं कि हम दोनों एक हैं। मन से इसे समझो। ‘मान’ के कारण ही ‘भेद’ उत्पन्न होता है। अतः भूलकर भी प्रिय से विमुख नहीं होना चाहिए।[24]

इसके साथ ही रसलीन ऐसे भाषाविद भी हैं कि उनका काव्य लोक मान्यताओं, आस्थाओं और लोकोक्तियों का समुच्चय प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए - 

  • आली बानर हाथ मैं परयो नारियर जाइ (बंदर के हाथ में नारियल, ग्लानि लक्षण, उदाहरण, रस प्रबोध, 836) 
  • आली चाटे ओस के कैसे ताप बुझाय (ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती; कामवती उदाहरण, रस प्रबोध, 304) 
  • गुरुजन उर दुरजन भये देखन देत न छाहिं (गुरुजनसभीता-असाध्या, रस प्रबोध, 225)
  •  रोग ठानि कै ढीठ तिय निपुन वैद करि ईठि। (पतिवंचिता-लक्षण, रस प्रबोध, 272)
  • तिहि तरुवर दहियत नहीं, रहियत जाकी छांह। (जिस पेड़ की छाया में रहते हैं उसे जलाया नहीं जाता; वियोग शृंगार, भेदोपाय उदहारण, 972) 
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि अपनी काव्य वस्तु, उसमें निहित काव्य प्रेरणा, काव्य रूढ़ियों के पालन तथा काव्यभाषा के गठन आदि विविध दृष्टियों से रसलीन भारतीय लोक, भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और भारतीय भाषा संपदा के गहरे पारखी, अध्येता और सर्जक थे। उनकी रचनाएँ यह प्रमाणित करने के लिए अत्यंत प्रबल साक्ष्य देती हैं कि हिंदी भाषा और साहित्य किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है बल्कि इसके विकास में सभी धर्मों के मानने वाले रचनाकारों का योगदान रहा है जिसके कारण यह भारतीय गंगा-जमुनी तहज़ीब प्रतीक बन गया है। 

संदर्भ 

[1] प्रगट हुसेनी बासती, बंस जो सकल जहान।/ तामैं सैद अब्दुल फरह, आए मधि हिंदुवान। (रस प्रबोध, कवि कुल कथन), रसलीन ग्रंथावली, पृ. 5 

[2] नूर चश्मे मीर बाकर गुफ्त बामन/ चूँ गुले खुरशीद दर आलम दमीदम/ साल तारीखे तवल्लुद खुद बेगुफ्तम/ नर चश्मे बाकरे अब्दुल हमीद। रसलीन ग्रंथावली, पृ. 55 

[3] (सं) वर्मा, धीरेंद्र. (2007, पुनर्मुद्रण). हिंदी साहित्य कोश, भाग -2. वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड. पृ. 480 

[4] तजि द्वार ईस को नवायो सीस मानुस को।/ पेट ही के काज सब, लाज खोइ बावरे। रसलीन ग्रंथावली, पृ. 303 

[5] वही, पृ. 1 

[6] शुक्ल, रामचंद्र. (संवत 2042 वि., इक्कीसवाँ पुनर्मुद्रण). हिंदी साहित्य का इतिहास. काशी : नागरी प्रचारिणी सभा. पृ. 197 

[7] (सं) वर्मा, धीरेंद्र. (2007, पुनर्मुद्रण). हिंदी साहित्य कोश, भाग -2. वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड. पृ. 477 

[8] बंसी ह्वै छुड़ावत है, बंस तैं न रीत कछू,/ बंसी सम लेत प्रान मीन को निकारि के./ अधर सुधा में लग उगलत हैं बिख एतो,/ अद्भुत भयो है यह जगत निहारि के./ मोहै मन देव औ, अदेव रसलीन जब,/ पसु पंछी थके मानो, डारि दई मारि के./ यातें बिधि मेरे जान, सेस कों न दीन्हों कान,/ सेस तन तान दीन्हों, धरती को डारि के। (रस प्रबोध, 98) 

[9] भादों के दिन कठिन बिन जादव मोहि बेहाइ।/ तापै छनदा की तड़ित छिन छिन दागति आइ। (रस प्रबोध, 1033) 

[10] रावण के हैं दस बदन, और बीस हैं बाँह।/ यह सुनि कै हिय मै, कछू भयो राम दल माँह॥ रसलीन ग्रंथावली, पृ. 242 

[11] रसलीन ग्रंथावली, पृ. 61 

[12] रसलीन ग्रंथावली, पृ. 56 

[13] नूर इलाह तें अव्वल नूर मुहम्मद को प्रगट्यो सुभ आई।/ पाछें भये तिहुंलोक जहाँ लग ऊसब सृष्टि जो दृष्टि दिखाई।/ आदि दलील को अंत की है रसलीन जो बात भई पुनि पाई।/ तौ लौं न पावै इलाही कों कैसेहूं जौ लौं मुहम्मद में न समाई। (रसलीन, फुटकल कवित्त और स्फुट दोहे) 

[14] बिस्नु जू के पग तें निकसि संभु सीस बसि,/ भगीरथ तप तें कृपा करी जहाँ पैं।/ पतिततन तारिबे की रीति तेरी एरी गंग,/ पाइ रसलीन इन्ह तेरेई प्रमाण पैं।/ कालिमा कलिंदी सुरसती अरुनाई दाऊ,/ मेटि-मेटि कीन्हैं सेत आपने विधान पैं।/ त्यों ही तमोगुन रजोगुन सब जगत के,/ करिके सतोगुन चढ़ावत बिमान पैं॥ (रसलीन, फुटकल कवित्त और स्फुट दोहे) 

[15] रस प्रबोध, 87 

[16] अलह नाम छबि देत यौं ग्रंथन के सिर आइ।/ ज्यों राजन के मुकुट तें अति सोभा सरसाइ।/ अलख अनादि अनंत नित पावन प्रभु करतार।/ जग को सिरजनहार अरु दाता सुखद अपार।/ रम्यौ सबनि मैं अरु रह्यौ न्योरा आपु बनाइ।/ याते चकित भये सबै लह्यौ न काहू जाइ।/ जब काहू नहिं लहि पायो कीन्हौं कोटि विचार।/ तब याहि गुन ते धर्यौ अलह नाम संसार। (रस प्रबोध, 4) 

[17] रसलीन ग्रंथावली, पृ. 85 

[18] री दामिनी घनस्याम मिली कत मो सनमुख आइ।/ हनन लगी है सौति लौं अपनो चटक दिखाइ॥ (रसलीन ग्रंथावली, कविता भाग, पृ. 192) 

[19] सागर दच्छिन दुहुन की सम बरनत हैं प्रीति।/ वह नदियन यह तियन सो मिलात एक ही रीति॥ (रसलीन ग्रंथवाली, कविता भाग, पृ. 102) 

[20] आज छठी की रात रहस रहस सब आन जगायो।/ रंग उपजायो धूम मचायो आपने चाव मेन मंगल गायों॥ (रसलीन, फुटकल कवित्त और स्फुट दोहे, 94) 

[21] यह लछमन घर आये।/ रहस रहस सब मिली गावौ आनंद बढ़ाये॥ (वही, 92) 

[22] लाज भरी समधिन सुनि के अति समधि के मन भाए,/ रहस खेल रस रेल करन कों सुभ दिन न्योत बुलाए। (वही, 89) 

[23] आप ही लाग लगाइ दृग फिरे रोवति यहि भाइ।/ जैसे आगि लगाइ कोउ जल छिरकत है आइ।। (रस प्रबोध, वियोग शृंगार, 957)/ हिये मटुकिया माहि मथि दीठि रई सो ग्वारि।/ मो मन माखन लै गई देह दही सो डारि॥ (रस प्रबोध, वियोग शृंगार, 958) 

[24] हम तुम दाऊ एक हैं समुझि लेहु मन माँहि।/ मान भेद को मूल है भूलि कीजिये नाहि॥ (रस प्रबोध, वियोग शृंगार, सामोपाय उदाहरण, 968)